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Date of publication : 20/8/2018 7:17
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यौमे अरफ़ा

यौमे अरफ़ा इमाम सज्जाद अ.स. ने एक शख़्स को किसी के सामने हाथ फैलाते देखा, आपने उससे कहा वाय हो तुझ पर! तू आज के दिन भी अल्लाह को छोड़ कर बंदों के सामने हाथ फैला रहा है! जबकि आज के दिन पूरी उम्मीद है कि अल्लाह की रहमत और उसका करम मां के पेट में पलने वाले बच्चों के लिए भी आम है।



विलायत पोर्टल : यौमे अरफ़ा अल्लाह की आम रहमत का दिन है, इस दिन पढ़ी जाने वाली दुआ मग़फ़ेरत और गुनाहों की माफ़ी का बेहतरीन ज़रिया है, इस मानवी और रूहानी दिन में वह दिल जो शौक़ या अल्लाह के ख़ौफ़ से लरज़ते हैं, वह आंखें जो आंसुओं की बारिश से भीग जाती हैं, वह आवाज़ें जो अपने गुनाहों का इक़रार करने के बाद अल्लाह की रहमत की भीख मांगती हैं और वह लरज़ते हुए हाथ जो उसकी बारगाह में उठते हैं सभी कुछ बहुत हसीन और ख़ूबसूरत दिखाई देता है। दुआए अरफ़ा इमाम हुसैन अ.स. द्वारा पढ़ी जाने वाली वह दुआ है जिसे आपने अरफ़ात के मैदान में सन् 60 हिजरी में पढ़ी थी, जिसमें अल्लाह के अज़ीम मर्तबे का इक़रार करते हुए उसकी बेशुमार नेमतों पर उसका शुक्र अदा किया गया है और साथ ही उन सारी मुश्किलों का ज़िक्र है जिसका इंसान इस दुनिया में पैदा होने के बाद से अब तक सामना करता है और उसके बावजूद अल्लाह की रहमत और मग़फ़ेरत हासिल करने की कोशिश करता है, बयान किया जाता है कि इस दुआ को इमाम हुसैन अ.स. ने  अरफ़ात के मैदान में अपने साथियों के साथ ख़ैमों से बाहर निकल कर पढ़ा है, यह दुआ एक लंबी दुआ है और शियों के ख़ास आमाल में से है जिसे ज़ोहरैन की नमाज़ के बाद से सूरज डूबने से पहले पहले तक पढ़ा जाता है।
रिवायतों में मिलता है कि शबे अरफ़ा की जाने वाली हर नेक दुआ क़ुबूल होती है और इस रात की जाने वाली इबादत और नेक आमाल 170 साल की इबादत का सवाब रखती हैं, यानी जो इस रात इबादत करेगा उसे 170 साल की इबादत का सवाब मिलेगा।
इस रिवायत से अरफ़ा की शब की अहमियत का अंदाज़ा लगाया जा सकता है, इसलिए इस रात की अहमियत को समझना चाहिए और जिस चीज़ की सबसे ज़्यादा ताकीद की गई है वह दुआ करना है रिवायत में मिलता है कि दुआ करो और यक़ीन रखो कि दुआ ज़रूर क़ुबूल होगी और ध्यान रहे इस रात इबादत के अलावा किसी और चीज़ में समय न गुज़रे, और दुआ करने के बारे में भी ख़्याल रहे कि इमाम मोहम्मद बाक़िर अ.स. ने फ़रमाया सबसे जल्दी जो दुआ क़ुबूल होती है वह अपने मोमिन भाई के लिए की जाने वाली दुआ है, आप उस मोमिन भाई के लिए उसकी ग़ैर मौजूदगी में अल्लाह से ख़ैर की दुआ करें इसलिए कि जो भी किसी दूसरे के लिए सच्चे दिल से दुआ करेगा अल्लाह उसे ज़रूर क़ुबूल करेगा।
जब बंदा अपने मोमिन भाई के लिए उसकी ग़ैर मौजूदगी में दुआ शुरु करता है तो वह फ़रिश्ते जो दुआ अल्लाह की बारगाह में ले जाने के लिए होते हैं वह कहते हैं कि बिल्कुल तुम्हारी यह दुआ भी क़ुबूल है और यही दुआ ख़ुद तुम्हारे लिए भी क़ुबूल है, यानी जो बंदा अपने मोमिन भाई के लिए अल्लाह की बारगाह हाथ फैला कर मांगता है वही उसे भी अल्लाह अता करता है।
शबे अरफ़ा से लेकर अरफ़ा के दिन सूरज डूबने तक बहुत क़ीमती समय है इसलिए जितना हो सके इस बीच में नेक आमाल अंजाम देना चाहिए और इस बात का यक़ीन रखना चाहिए कि वह जो कुछ अपने दूसरे भाई के लिए अल्लाह से मांगेगा अल्लाह उससे कहीं ज़्यादा उसे अता करेगा। एक रिवायत में ज़िक्र हुआ है कि यौमे अरफ़ा इमाम सज्जाद अ.स. ने एक शख़्स को किसी के सामने हाथ फैलाते देखा, आपने उससे कहा वाय हो तुझ पर! तू आज के दिन भी अल्लाह को छोड़ कर बंदों के सामने हाथ फैला रहा है! जबकि आज के दिन पूरी उम्मीद है कि अल्लाह की रहमत और उसका करम मां के पेट में पलने वाले बच्चों के लिए भी आम है। इमाम जाफ़र सादिक़ अ.स. का इरशाद है कि अगर किसी की माहे रमज़ान में मग़फ़ेरत न हुई तो उसकी कभी मग़फ़ेरत नहीं हो सकती मगर यह कि यौमे अरफ़ा मग़फ़ेरत की दुआ करे।
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