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Date of publication : 15/9/2018 16:24
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इमाम हुसैन अ.स. के इंक़ेलाब में औरतों का किरदार

आशूर के इंक़ेलाब को मर्दों और औरतों ने मिल कर कामयाब बनाया और दर्दनाक मौत और शहादत और अपमानित ज़िंदगी के बीच शहादत को चुन कर आज़ादी के सही मतलब को दुनिया तक पहुंचा दियाl आशूर के इंक़ेलाब में ज़्यादातर वह वफ़ादार साथी जो आपके साथ शहीद हुए उनकी तरफ़ ध्यान दिया जाता है और औरतों के किरदार और उनके रोल पर चर्चा कम हो पाती है, हम इस लेख में संक्षेप में कर्बला के इंक़ेलाब में औरतों के किरदार की तरफ़ इशारा कर रहे हैंl

विलायत पोर्टल : आशूर को पेश आने वाला इंक़ेलाब ऐसा स्रोत है जिससे 14 शताब्दियां गुज़रने के बाद भी अहलेबैत अ.स. मोहब्बत रखने वाले सीख हासिल कर रहे हैं, यह हक़ीक़त है कि आशूर जैसे अज़ीम इंक़ेलाब के कारण और नतीजे से पूरा समाज प्रेरित होता है, यानी शिया और अहलेबैत अ.स. की पैरवी करने वालों ने आशूर से सबक़ ले कर ज़िंदगी गुज़ारी है और इस अज़ीम इंक़ेलाब को बाक़ी रखने के लिए अपनी जानें तक क़ुर्बान कर दी हैंl
आशूर का दिन हक़ और बातिल की जंग, ईसार व वफ़ादारी और दीन और अक़ीदे के नाम पर मर मिटने के लिए मशहूर है कि जिस दिन इमाम हुसैन अ.स. ने अपने बहुत कम मगर बा ईमान, मज़बूत इरादे वाले साथियों के साथ अल्लाह की राह में इस्लाम के परचम को उठा कर एक ऐसी फ़ौज के सामने डटे रहे जो बे रहम, फासिक़ और बे दीन और इस्लाम को मिटाने पर तुले हुए थे, वह अल्लाह की राह में इन बे दीन लोगों का मुक़ाबला करते हुए आगे बढ़ते रहे और अपना ख़ून बहा कर कर्बला की ख़ाक जो केवल ख़ाक थी उसे ख़ाके शेफ़ा बना गए, और पूरी दुनिया को सबक़ सिखा गए कि ज़िंदगी अगर अपमान के साथ गुज़ारनी पड़े तो उससे बेहतर है कि सम्मान के साथ मर जाएl
आशूर के दिन पेश आने वाला इंक़ेलाब हालांकि एक दिन में पेश आया लेकिन क्या कहना उसके प्रभाव का कि इतनी शताब्दियों के बाद भी ऐसा प्रभाव दिलों पर छोड़ा कि आज भी मोहर्रम में उसके असर को महसूस किया जा सकता है ख़ास कर आशूर के दिन जब दुनिया के कोने कोने में हुसैन इब्ने अली अ.स. और उनके वफ़ादार साथियों की शहादत पर हाथों को सरों और सीनों पर मार कर अपने ग़म को ज़ाहिर किया जाता है और ऐसा केवल शिया फिर्क़ा ही नहीं करता बल्कि जिनका इस्लाम से दूर दूर तक कोई रिश्ता भी नहीं वह भी कर्बला वालों की दर्दनाक दास्तान को सुन कर अपने ग़म को अपने अपने अंदाज़ से ज़ाहिर करते हैं, आशूर के दिन पैग़म्बर स.अ. की हदीस "हुसैन मुझसे है और मैं हुसैन से हूं" के मतलब को मुकम्मल करता है, और वह इस तरह कि पैग़म्बर स.अ. का "हुसैन मुझसे है" कहना समझ में आता है लेकिन "मैं हुसैन से हूं" को कैसे समझा जाए? तो इस हक़ीक़त का पता तब चला जब इमाम हुसैन अ.स. ने अपने और अपनी औलाद के ख़ून से पैग़म्बर स.अ. के दीन को ऐसे समय में सींचा जब पैग़म्बर स.अ. द्वारा लगाए गए पेड़ को यज़ीद जैसा फासिक़ और बे दीन का अमल मुरझाने पर लगा थाl
इमाम ख़ुमैनी र.ह. के क़ौल के मुताबिक़ आशूरा का इंक़ेलाब अदालत को पसंद करने वालों का इंक़ेलाब था जिनकी तादाद कम थी लेकिन ईमान में मुकम्मल थे और ऐसे शख़्स का सामना किया जो ज़ालिम, मुस्तक्बिर और बर्बादी करने वाला थाl
अगर आशूर के दिन इमाम हुसैन अ.स. की कुर्बानियां न होतीं और बनी उमय्या की जेहालत भरी लॉजिक काम कर जाती कि अपने लाल क़लम को अल्लाह की किताब क़ुरआन पर चलाएं और अपने बातिल ख़्याल में हुसैन इब्ने अली अ.स. को क़त्ल कर के इस्लाम की बुनियाद को हिलाएं और इस ऐलान को आम कर दें कि "न कोई वही (وحی) आई न कोई इलाही पैग़ाम आया" तो पता नहीं दीन पर क्या गुज़र जातीl
आशूर के इंक़ेलाब को मर्दों और औरतों ने मिल कर कामयाब बनाया और दर्दनाक मौत और शहादत और अपमानित ज़िंदगी के बीच शहादत को चुन कर आज़ादी के सही मतलब को दुनिया तक पहुंचा दियाl
आशूर के इंक़ेलाब में ज़्यादातर वह वफ़ादार साथी जो आपके साथ शहीद हुए उनकी तरफ़ ध्यान दिया जाता है और औरतों के किरदार और उनके रोल पर चर्चा कम हो पाती है, हम इस लेख में संक्षेप में कर्बला के इंक़ेलाब में औरतों के किरदार की तरफ़ इशारा कर रहे हैंl
हक़ीक़त में आशूर के इंक़ेलाब में औरतों का किरदार आशूर के इंक़ेलाब को ज़िंदा रखने में काफ़ी अहम भूमिका निभाता है और सारी मुसलमान औरतों को उन बा ईमान और बुलंद हौसले वाली पाक औरतों से ईमान और क़ुर्बानी का सबक़ हासिल करना चाहिएl
कर्बला में अलग अलग एतेबार से औरतों का किरदार हमारी निगाहों के सामने है उनमें से कुछ को पेश किया जा रहा हैl
** ज़ुल्म से जेहाद में शामिल रहना: इमाम हुसैन अ.स. के साथ जंग के मैदान में मौजूद रहना या उसके अलावा उनका दूसरे जंगी मामलात में शामिल रहना उनकी बहादुरी और हिम्मत को दर्शाता है (चूंकि औरतें ख़ून, ज़ख़्म या लाश देख कर बहुत जल्द घबरा जाती हैं लेकिन कर्बला की औरतें ख़ुद ज़ख़्मी लाशों को उठाने में इमाम हुसैन अ.स. की मदद करती दिखाई देती हैं) अकेले और तंहा मुस्लिम इब्ने अक़ील को कूफ़े में तौआ की मदद से लेकर शाम और कूफ़ा के रास्ते में दुश्मनों की हरकतों पर कुछ शहीदों की बीवियों द्वारा आलोचना और कड़े शब्दों में निंदा तक लगातार उनकी बहादुरी उनके कर्बला के इंक़ेलाब में शामिल रहने पर बेहतरीन दलील हैl (जैसाकि ख़ूली द्वारा कूफ़ा और शाम के रास्तों में कोड़ों से किए जाने वाले ज़ुल्म पर उनका आवाज़ उठाना)
** हौसला बढ़ाना: जंग में हौसला बढ़ाना एक अहम काम होता है, क्योंकि कभी इंसान पहले से तैयार रहता है लेकिन ठीक काम को करने के समय चाहे लालच की बुनियाद पर चाहे डर की वजह से पीछे हटता दिखाई देता है, कर्बला के मैदान में हौसला बढ़ाने का अजीब तरीक़ा दिखाई देता है कि कहीं वहब की मां अपने बेटे का सर क़ातिल की तरफ़ फेंक कर कहती हुई दिखाई देती हैं कि हम जो अल्लाह की राह में दे देते हैं वह वापस नहीं लिया करते, कहीं हज़रत ज़ैनब स.अ. खै़मे के अंदर अपने दोनों बेटों की लाशों के बीच शुक्र का सजदा कर के दूसरी सारी औरतों का हौसला बढ़ाती हुई दिखाई देती है, और इन कर्बला की पाक और बुलंद हौसला औरतों ने केवल कर्बला के जवानों का हौसला नहीं बढ़ाया बल्कि उनके अमल ने ऐसी एनर्जी डाली कि आज भी उसका असर देखा जा सकता है, चाहे सद्दाम और साम्राज्यवादी शक्तियों द्वारा ईरान पर हमला हो या इस्राइल द्वारा लेबनान और फिलिस्तीन पर, चाहे वहाबी आतंकियों द्वारा सीरिया और इराक़ पर हमला हो या आले सऊद और आले ख़लीफ़ा द्वारा यमन और बहरीन पर, इन सारी जगहों पर ज़ुल्म का मुक़ाबला करने वालों की माओं ने कर्बला की पाक और नेक औरतों की सीरत से प्रभावित होकर और सीख लेकर अपने बच्चों में वह हौसला और हिम्मत पैदा कर दी जिससे वह ज़ुल्म का मुक़ाबला करने के लिए सर से कफ़न बांध कर मैदान में डटे हुए हैंl
** दीनी मामलात का ख़्याल: कर्बला में इमाम हुसैन अ.स. और उनके साथियों की शहादत के बाद अहले हरम की असीरी के बारे में मिलता है कि तमाशा देखने वालों के बीच से अहले हरम को गुज़ारा जाता है, अहले हरम की चादरें छीनी जा चुकी थीं लेकिन बालों द्वारा अपने चेहरे का पर्दा कर के आज की औरतों को पैग़ाम दे रही थीं कि शहीदों के ख़ून अहमियत को हम ऐसे ख़ून रुला देने वाले माहौल से बचा कर तुम तक पहुंचा रहे हैं और केवल यही नहीं हज़रत उम्मे कुलसूम स.अ. ने कूफ़ा के तमाशा देखने वालों की भीड़ को गै़रत दिलाते हुए कहा कि तुमको शर्म नहीं आती! तुम पैग़म्बर स.अ. के अहलेबैत अ.स. कई तमाशा देखने जमा हुए हो! और जब कूफ़ा के एक घर में जमा हुए तो हज़रत ज़ैनब स.अ. ने कहला दिया कि औरतों के अलावा यहां कोई न आए, और फिर यज़ीद के महल में आपका वह ऐतिहासिक ख़ुतबा जिसमें आपने यज़ीद को भरे दरबार में बे नक़ाब करते हुए फ़रमाया: क्या यही अदालत है कि अपनी कनीज़ों और औरतों को पर्दे के अंदर बिठाए और रसूल की बेटियों को क़ैदी बना कर सबके सामने बुलवाए!! तूने उनकी हुरमत को रौंद डाला उनके चेहरों को सबके सामने खुलवाया और गली मोहल्लों में फिराया, रास्ता चलने वाले और छतों पर बैठने वाले उनका तमाशा देख रहे थे......
ऐसे और भी बहुत सी घटनाएं मौजूद हैं जिन्हें देख कर अच्छी तरह अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि इमाम हुसैन अ.स. के इंक़ेलाब की कामयाबी में और कर्बला के पैग़ाम को फैलाने में कर्बला की बहादुर और बुलंद हौसला औरतों का अहम किरदार हैl


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