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Date of publication : 15/10/2018 8:46
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अरबईन पर जाने वालों के लिए मराज-ए-केराम की नसीहतें

ज़ाहिर है जहां 20 मिलियन या उस से ज़्यादा की पब्लिक हो वहां कुछ ऐसी परिस्तिथियां भी होंगी जहां एक ही समय में कई लोगों की एक साथ कुछ ज़रूरतें होंगी, ऐसे समय में दूसरों की ज़रूरत को ख़ुद की ज़रूरत से ज़्यादा अहमियत देना ही आपसी मोहब्बत और सार्वजनिक बलिदान की बेहतरीन मिसाल हो सकती है, इसलिए सभी ज़ायरीन से गुज़ारिश है जहां तक हो सके दूसरों की ज़रूरतों को ख़ुद से ज़्यादा अहमियत दें क्योंकि यह कर्बला की अहम तालीमात का हिस्सा है।
विलायत पोर्टल :  अरबईन का सफ़र जिसको वली-ए-फ़क़ीह आयतुल्लाह ख़ामेनई ने जो नाम दिया है उससे बेहतर शायद ही इस सफ़र को कोई नाम दिया जा सके और वह सफ़रे ईमान व इश्क़ जो अक़्ल और जज़्बात के साथ है। कुछ ही दिन बाद लगभग 20 से 25 मिलियन ज़ायरीन कर्बला में इमाम हुसैन अ.स. की ज़ियारत के लिए जमा होंगे, बिना किसी शक के यह लोगों का जमा होना शआएरे इलाही में से है। इसी मौक़े के लिए इमाम जाफ़र सादिक़ अ.स. की है यह हदीस है कि जो भी अपने घर से इमाम हुसैन अ.स. की ज़ियारत को निकले, अगर वह पैदल जा रहा है तो उसके हर क़दम के बदले उसके आमाल नामे में एक नेकी लिखी जाएगी और एक गुनाह को मिटा दिया जाएगा, और जिस समय वह इमाम हुसैन अ.स. की क़ब्र के पास पहुंचता है फ़रिश्ते उसका नाम नेक और निजात हासिल कर चुके लोगों में लिख देते हैं और जब ज़ियारत मुकम्मल हो जाती है तो उसका नाम कामयाब लोगों की लिस्ट में लिख लेते हैं।
जब वह हरम से बाहर निकलता है तो फ़रिश्ते उसे मुबारकबाद देते हैं कि अल्लाह के रसूल ने तुझे सलाम कहा है और फ़रमाया है कि अपने आमल पर ध्यान रखो, आज तुमने नया जन्म लिया है क्योंकि तेरे सारे गुनाह माफ़ कर दिए गए हैं। (कामिलुज़-ज़ियारात, पेज 132)
यह दिन वह हैं जिसमें बहुत से लोग इस सफ़रे ईमान व इश्क़ के लिए निकल चुके हैं या निकलने वाले हैं, जिनके लिए मराजे की तरफ़ से कुछ नसीहतें हैं जिनमें वली-ए- फ़क़ीह आयतुल्लाह ख़ामेनई, आयतुल्लाह मकारिम शीराज़ी, आयतुल्लाह नूरी हमदानी, आयतुल्लाह साफ़ी गुलपाएगानी, आयतुल्लाह वहीद ख़ुरासानी, आयतुल्लाह शुबैरी ज़ंजानी, आयतुल्लाह जवादी आमुली और आयतुल्लाह अलवी गुर्गानी शामिल हैं, जिनपर अमल करना हर ज़ाएर के ईमान की बुलंदी की अलामत है और उन बुज़ुर्ग मराजे के हुक्म पर अमल दीन पर अमल है। इनमें से हर किसी ने तफ़सीली तौर पर सभी ज़ायरीन को नसीहत की है लेकिन हम उन सभी की नसीहतों को ख़ुलासा यहां बयान कर रहे हैं।
** इमाम हसन असकरी अ.स. की मशहूर हदीस जिसमें मोमिन की पांच निशानियां बयान की गई हैं जिसमें दिन भर में 51 रकअत नमाज़ (17 रकअत वाजिब, 34 रकअत मुस्तहब) नमाज़ में बिस्मिल्लाह का तेज़ आवाज़ से पढ़ना, ख़ाक पर सजदा करना, और दाहिने हाथ की उंगली में अंगूठी का पहनने के साथ ज़ियारते अरबईन को भी मोमिन की अलामत और निशानी बताया है, यही वजह है कि सारे मराजे सभी मोमेनीन को ज़िंदगी में एक बार अरबईन की ज़ियारत पर जाने की नसीहत ज़रूर करते हैं ताकि मोमिन की बाक़ी निशानियों के साथ साथ यह भी हासिल हो जाए।
** ज़ाहिर है जहां 20 मिलियन या उस से ज़्यादा की पब्लिक हो वहां कुछ ऐसी परिस्तिथियां भी होंगी जहां एक ही समय में कई लोगों की एक साथ कुछ ज़रूरतें होंगी, ऐसे समय में दूसरों की ज़रूरत को ख़ुद की ज़रूरत से ज़्यादा अहमियत देना ही आपसी मोहब्बत और सार्वजनिक बलिदान की बेहतरीन मिसाल हो सकती है, इसलिए सभी ज़ायरीन से गुज़ारिश है जहां तक हो सके दूसरों की ज़रूरतों को ख़ुद से ज़्यादा अहमियत दें क्योंकि यह कर्बला की अहम तालीमात का हिस्सा है।
** ज़ायरीन को इस सफ़र पर सारे राजनीतिक और सियासी मतभेद को किनारे रख कर इत्तेहाद की मिसाल पेश करनी चाहिए, जिसके लिए ज़रूरी है कि अज़ादारी में बिदअत को शामिल न किया जाए, इसी तरह पैदल चलने वाले ज़ायरीन की मेहमान नवाज़ी में भी किसी तरह का भेदभाव नहीं होना चाहिए, हर आने वाला इमाम हुसैन अ.स. का ज़ाएर है इसलिए चाहे खाना पीना हो या मौकिब में रुकना सबको एक निगाह से देखना चाहिए।
** एक और अहम बात जिस पर सभी मराज-ए-केराम हर साल काफ़ी ज़ोर देते हैं वह यह है कि सुरक्षा से संबंधित सभी क़ानून का पालन करना है, क्योंकि यह करोड़ों की तादाद दुश्मन की आंख का कांटा होती है इसलिए ख़तरा बना रहता है इसलिए सुरक्षा पोस्ट पर चेकिंग हो या और दूसरी सारी चीज़ें हर जगह हुकूमत के क़ानून का पालन करना ज़रूरी है। इसलिए इस इबादत के सफ़र को शरीयत के ख़िलाफ़ काम कर के बातिल न करें और बिना पासपोर्ट, बिना वीज़ा या बार्डर के अलावा किसी दूसरे इलाक़े से छिप कर सफ़र करना बिल्कुल सही नहीं है और ऐसी हालत में उस ज़ियारत का सवाब भी नहीं मिलेगा और साथ ही इंसान गुनाहगार भी होगा।
** मराजे की नसीहतों में से एक और अहम नसीहत हमारी ज़ाएर बहनों के लिए है कि वह बिना किसी महरम को साथ लिए सफ़र पर न जाएं।
** बहुत सारे उलमा और मराजे इस बात पर ज़ोर देते हुए कहते हैं कि काश वह भा ज़ायरीन के इस पैदल क़ाफ़िले में शामिल होते, जबकि ऐसा कहने वालों में से बहुत से उलमा ऐसे हैं जो कई साल तक नजफ़ में रहे हैं और उन्हें इस पैदल सफ़र की सआदत नसीब हो चुकी है, इसलिए ज़ायरीन से उन्होंने चाहा है कि वह इस्लाम और मुसलमानों की अज़मत और इमाम महदी अ.स. के ज़ुहूर के लिए दुआ करें और साथ ही उन्हें भी अपनी दुआओं में याद रखें।
** अरबईन के मौक़े पर जमा होने वाली यह करोड़ों की तादाद दीन की तबलीग़ और कर्बला के पैग़ाम को पहुंचाने का बहुत बड़ा प्लेटफ़ार्म है, जैसाकि आयतुल्लाह मकारिम शीराज़ी फ़रमाते हैं कि इतनी बड़ी तादाद में ऐसी अज़ीम जगह पर लोगों का जमा होना एक बहुत बड़ी नेमत है क्योंकि यह मौक़ा होता है जब लोगों का दिल इमाम हुसैन अ.स. के इश्क़ में डूब कर हर अच्छी और नेक बात मानने को तैयार दिखाई देता है, बहुत से लोग ऐसे भी होते हैं जो पूरे साल के साल किसी भी अहकाम और शरीयत के हुक्म बताने वाले के पास न बैठते हों लेकिन वह इस मौक़े को हाथ से जाने नहीं देना चाहते, हमें भी ऐसे लोगों के लिए इसी मौक़े पर कुछ ऐसा प्रोग्राम तैयार करना चाहिए जिससे वह इमाम हुसैन अ.स. की ज़ियारत के साथ साथ कुछ दीन के अहकाम को भी सीख सकें।
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