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Date of publication : 16/10/2018 19:28
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विलायत और तौहीद का आपसी रिश्ता

"ला इलाहा इल्लल्लाह मेरा क़िला है और जो मेरे क़िले में दाख़िल हो गया वह मेरे अज़ाब से महफ़ूज़ हो गया, कुछ दूर जाने के बाद इमाम अ.स. रुके और फिर फ़रमाया वह तौहीद जो इंसान को अल्लाह के अज़ाब से बचाती है और उसकी कुछ शर्तें हैं और उन शर्तों में से एक शर्त इमामों की इमामत और विलायत का इक़रार है।

विलायत पोर्टल :  इस्लाम और ख़ास तौर से शिया फ़िर्क़ा जो हक़ीक़ी इस्लाम की मुकम्मल तस्वीर है, शिया मकतब में विलायत और इमामत को ख़ास अहमियत हासिल है और इसका अंदाज़ा इस हदीस से लगा सकते हैं कि अगर कोई अपने दौर के इमाम अ.स. की मारेफ़त हासिल किए बिना मर जाए तो उसकी मौत जेहालत की मौत है, इस्लाम की बुनियाद ही विलायत पर रखी गई है जैसाकि हदीस में ज़िक्र हुआ है कि इस्लाम की बुनियाद पांच चीज़ों पर है, नमाज़, ज़कात, रोज़ा, हज और विलायत।
इन पांचों में जितनी अहमियत विलायत को दी गई है किसी दूसरे रुक्न को नहीं दी गई है, और उसकी वजह यह है कि विलायत पर इस्लाम की हिफ़ाज़त और लोगों को सेराते मुस्तक़ीम की तरफ़ हिदायत की ज़िम्मेदारी है और विलायत ही लोगों को सआदत तक पहुंचाती है।
जितने फ़िर्क़े विलायत और इमामत से दूर हुए आप उन्हें देख सकते हैं कि वह किस तरह नए नए मसलों को हल करने में असमर्थ हैं और व्यक्तिगत राय के चलते आपस में भिड़े हुए हैं, विलायत के बिना तौहीद भी मुकम्मल नहीं है क्योंकि ज़ालिमों और बातिल हाकिमों की विलायत और सरपरस्ती में तौहीद के हाकिम होने का सवाल ही नहीं होता।
जैसाकि हदीसे सिलसिलतुज़-ज़हब  में इमाम रज़ा अ.स. फ़रमाते हैं कि "ला इलाहा इल्लल्लाह मेरा क़िला है और जो मेरे क़िले में दाख़िल हो गया वह मेरे अज़ाब से महफ़ूज़ हो गया, कुछ दूर जाने के बाद इमाम अ.स. रुके और फिर फ़रमाया वह तौहीद जो इंसान को अल्लाह के अज़ाब से बचाती है और उसकी कुछ शर्तें हैं और उन शर्तों में से एक शर्त इमामों की इमामत और विलायत का इक़रार है।
इमामों की ज़ियारत से इमामत और विलायत के बुनियादी अक़ीदों को मज़बूती मिलती है, ज़ायर ज़ियारत में बारह इमामों की विलायत को याद करता है और उनके साथ अहदे विलायत करता है, हमारे अधिकतर ज़ियारतनामों में यही मफ़हूम मिलता है जिसमें ज़ाएर अपने इमामों की अलग अलग सिफ़ात को याद करता है और उन्हें अपना इमाम और अपने लिए आइडियल मानता है और उनकी इताअत और पैरवी करने और उनके दुश्मनों से दूरी बनाने का अहद करता है, ज़ाएर यह आरज़ू करता है ऐ काश मैं आपके साथ होता और आपके साथ आपकी रेकाब में रहने का शरफ़ हासिल कर पाता, अभी भी मैं इसी इंतेज़ार में हूं कि आपकी हुकूमत क़ायम हो ताकि मैं आपकी मदद के लिए आगे बढ़ूं और इस्लामी क़ानून को लागू करने में आपका साथ दूं, जैसाकि सभी ज़ियारत जैसे ज़ियारते जामेआ में तौहीद के इक़रार के बाद नबुव्वत और विलायत की गवाही देता है और अलग अलग तरीक़ों से इमाम अ.स. की फ़ज़ीलत बयान करता है, जहां यह ज़ियारतें अपने इमाम अ.स. की ख़िदमत में अपनी मोहब्बत का इज़हार है वहीं इमाम अ.स. की मुबारक ज़ुबान से निकले हुए ज़ियारत की लफ़्ज़ इमाम अ.स. की हक़ीक़ी मारेफ़त की वजह भी हैं।
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