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Date of publication : 14/11/2018 8:20
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बीवी क्या करे कि घर जन्नत की मिसाल हो

माफ़ कीजिए आगे ध्यान रहेगा, या माफ़ कर दीजिए फिर कभी शिकायत का मौक़ा नहीं दूंगी.... अल्लाह का ख़ौफ़ दिल में रखने वाली समझदार बीवी जब इस जुमले को कहेगी तो यक़ीन जानिए कि शैतान के लिए घर में झगड़ा करवाने का कोई हथियार बाक़ी नहीं बचेगा।


विलायत पोर्टल :  इस लेख में कुछ चीज़ों की तरफ़ इशारा किया जा रहा है जिनका ख़्याल हमारे घर के माहौल को बेहतरीन बना सकता है या यूं कहा जाए कि हमारा घर जन्नत बन सकता है, किसी भी घर और फ़ैमिली के दो अहम रुक्न और पिलर होते हैं जिनके बिना परिवार बन ही नहीं सकता और वह पति औप पत्नी हैं। और अगर इन दोनों के बीच रिश्ते की मधुरता बनी रहे तो घर किसी जन्नत से कम नहीं लेकिन अगर अल्लाह न करे यह रिश्ता किसी भी ग़लत फ़हमी या किसी दूसरी बुराई की भेंट चढ़ गया तो वही घर जहन्नम से भी भयानक हो जाता है। सबसे पहले इस लेख में हम एक घर का जन्नत जैसा माहौल कि जहां आर्थिक तंगी, बीमारी, परेशानी और तकलीफ़ के बाद भी बेहतर बना रहे उनमें वह चीज़ें जिनका ख़्याल पत्नी के लिए ज़रूरी है उनको बयान करेंगे।
पति के साथ लगातार नेक बर्ताव करें
कहते हैं कि नेकी और भलाई करने वाला तो अपनी नेकी भूल जाता है लेकिन जिसके साथ नेकी की जाती है वह नहीं भूला करता, हदीस में है कि इंसान ख़ुद पर एहसान करने वाले का ग़ुलाम बन जाता है, वह आपका ख़ादिम बन जाता है, नेक बीवी की नेकी भुलाई नहीं जा सकती, एक नेक बीवी अपने आपको नेकी पर यह कह कर उभार सकती है कि मैं जिस दिन दुनिया से चली गई मेरी नेकी मेरे शौहर को याद आएगी और मेरे शौहर मेरे लिए दुआ करेंगे, मुझे अच्छाई के साथ याद करेंगे, मेरी ख़िदमत उनको रात के अंधेरों और दिन के उजालों में याद करने पर मजबूर करेगी और शायद यही मेरी मग़फ़ेरत और अल्लाह के राज़ी होने के लिए काफ़ी हो। हज़रत आएशा कहती हैं कि जितना रश्क मुझे हज़रत ख़दीजा स.अ. पर हुआ उतना पैग़म्बर स.अ. की किसी बीवी पर नहीं हुआ जबकि मैंने उन्हें देखा भी नहीं था।
इतने रश्क की वजह यह थी कि पैग़म्बर स.अ. दिन रात उनका ज़िक्र करते थे और आपका दस्तूर यह था कि आप जब भी क़ुर्बानी करते थे उसका गोश्त हज़रत ख़दीजा स.अ. की सहेलियों को तोहफ़े के तौर पर ज़रूर भेजते थे, एक दिन आपने उनका ज़िक्र किया तो मैंने अर्ज़ की ऐ अल्लाह के रसूल आप उनका इतना ज़िक्र क्यों करते हैं जबकि अल्लाह ने उनसे बेहतर दिया है? तो आपने फ़रमाया, अल्लाह की क़सम उनके (हज़रत ख़दीजा स.अ.) बाद अल्लाह ने मुझे जो दिया है वह उनसे बेहतर नहीं हैं, वह उस समय ईमान लाईं जब लोग काफ़िर थे, उन्होंने उस समय मेरा साथ दिया और सपोर्ट किया जब लोग मुझे झुठला रहे थे, उन्होंने उस समय अपना माल मेरे क़दमों में डाला जब लोग मेरा आर्थिक बॉयकाट कर रहे थे, अल्लाह ने मुझे उनसे औलाद अता की किसी और से नहीं की।
औरत अगर अपने शौहर की कनीज़ बन कर रहे तो शौहर भी अपनी बीवी की बातों को मानेगा, इसलिए अगर बीवी चाहती है कि शौहर उसके कहने में रहे और हर बात में उसकी पैरवी करे तो उसको शौहर के साथ नेक रवैया अपनाना होगा और उसकी इताअत करनी होगी, उसकी ग़लतियों को नज़रअंदाज़ करना होगा, उसको ग़ुलाम बनाने से पहले ख़ुद उसकी कनीज़ बनना होगा, इसलिए कि मोहब्बत मोहब्बत को खींचती है, इताअत इताअत को खींचती है, बग़ावत और बद ज़ुबानी, नफ़रत और झगड़ों को ख़ीच कर लाती है।
जी हां बोलना सीख लें
यह झगड़े से निजात पाने का गोल्डन नुस्ख़ा है। मिसाल के तौर पर शौहर अगर कहे कि आज कहीं जाना है तो कहे जी हां इंशा अल्लाह ज़रूर चलेंगे, अगर शौहर का किसी इवेंट में जाने का दिल नहीं चाह रहा है तो अपने दिल की ख़्वाहिश उस पर थोपने के बजाए कहे कि कोई बात नहीं मैं भी नहीं जाऊंगी जैसा आप चाहेंगे वैसा ही होगा आप मेरे शौहर हैं जैसा आप कहेंगे वैसा ही होगा। और अगर बीवी का दिल बहुत ज़्यादा किसी इवेंट या किसी प्रोग्राम में जाने का कर रहा है तो इंतेज़ार करें जब शौहर थोड़ा नॉर्मल दिखाई दे और ख़ुशहाल हो तो उससे नर्मी से कहे कि अगर आपकी इजाज़त हो तो मैं इस प्रोग्राम में चली जाऊं, क्योंकि उनके यहां ख़ुशी का मौक़ा है अगर मैं नहीं गई तो वह शिकायत भी करेंगे और उनकी ख़ुशी में शामिल नहीं हो सकूंगी इसलिए अगर इजाज़त दे दें तो मेहेरबानी होगी अगर वह भी फिर भी न माने तो सब्र कर लें।
यक़ीन जानिए कि अगर बीवी ने कुछ मामलों ने ऐसा ही रवैया अपनाया तो शौहर आपकी बातों को नकार नहीं सकेगा।
माफ़ कर दीजिए, फिर कभी ऐसा नहीं होगा
यह एक ऐसा जुमला है जो पत्थर दिल इंसान के भी मोम बना देता है, बड़ी से बड़ी ग़लती को भी छोटा बना देता है, भयंकर से भयंकर आग के लिए पानी का काम करता है, ज़ालिम को रहम करने पर मजबूर कर देता है, दुश्मन को दोस्त बना देता है। यह नुस्ख़ा किसी इंसान का नहीं बल्कि इंसानों को पैदा करने वाले उस अल्लाह का है जो हकीम है, इरशाद होता है कि नेकी और बुराई बराबर नहीं होती, आप नेक बर्ताव से बुराई को टाल दें, (फिर आप अचानक देखेंगे) कि आपमें और उस शख़्स में जो दुश्मनी थी वह ऐसा हो जाएगा कि जैसे कोई पक्का दोस्त होता है। (सूरए सजदा)
बीवी को मुंहज़ोरी नहीं करना चाहिए, शौहर से बहस नहीं करनी चाहिए, इधर उधर की बातें बनाने से बेहतर सौ बातों की एक बात कि ग़लती हो गई माफ़ी चाहती हूं फिर कभी ऐसा नहीं होगा।
यह एक ऐसा जुमला है जो हज्जाज इब्ने यूसुफ़ जैसे ज़ालिम को भी नर्मी पर मजबूर कर देता है, जैसा कि नक़्ल है कि एक बार हज्जाज ने सफ़र को दौरान एक देहाती से इम्तेहान के तौर पर पूछा कि तुम्हारा बादशाह हज्जाज कैसा है?
उसने जवाब दिया अरे वह, वह तो बहुत ज़ालिम है, अल्लाह उससे बचाए, वग़ैरह वग़ैरह
तो हज्जाज ने उससे कहा तुम मुझे जानते हो मैं कौन हूं?
उसने कहा नहीं, तो बादशाह ने कहा मैं हज्जाज इब्ने यूसुफ़ हूं।
देहाती ने कहा, तुम मुझे जानते हो, मैं कौन हूं?
हज्जाज ने कहा नहीं,
तो उसने जवाब दिया मैं एक बीमार हूं, हर महीने तीन दिन के लिए पागल हो जाता हूं, और आज मेरे पागल बनने का पहला दिन है, माफ़ कर दीजिए।
हज्जाज यह सुन कर हंसने लगा और उसको छोड़ दिया।
अब आप अंदाज़ा लगाइए कि अगर छोटा अपने बड़े के सामने ग़लती के समय यह कहे कि ग़लती हो गई, फिर कभी नहीं होगा, या माफ़ कीजिए आगे ध्यान रहेगा, या माफ़ कर दीजिए फिर कभी शिकायत का मौक़ा नहीं दूंगी।
अल्लाह का ख़ौफ़ दिल में रखने वाली समझदार बीवी जब इस जुमले को कहेगी तो यक़ीन जानिए कि शैतान के लिए घर में झगड़ा करवाने का कोई हथियार बाक़ी नहीं बचेगा।
ख़ामोशी अपनाएं
लड़ाई झगड़े को ख़त्म करने का सबसे बेहतरीन नुस्ख़ा है। एक दास्तान कुछ इस तरह किताबों में नक़्ल हुई है कि एक औरत एक आलिम के पास गई और कहा मुझे कोई ऐसा तावीज़ दे दीजिए कि मेरा शौहर मुझसे झगड़ा न करे और केवल मेरी बात माने, आलिम ने जवाब में कहा कि तुम थोड़ा पानी ले आओ मैं दुआ पढ़ देता हूं, वह पानी ले आई आलिम ने दुआ पढ़ दी और कहा जब तुम्हारा शौहर ग़ुस्से में हो तो इस पानी का एक घूंट अपने मुंह में ले कर बैठ जाना और ध्यान रहे पानी हलक़ से नीचे बिल्कुन न उतरे।
उस औरत ने वैसा ही करना शुरू कर दिया, जब भी कभी शौहर को ग़ुस्सा आता तो मुंह में उस पानी का घूंट लेकर बैठ जाती, मुंह में पानी होने की वजह से बोल तो सकती नहीं थी, जब शौहर की नाराज़गी के समय इस औरत का सवाल जवाब बंद हो गया तो धीरे धीरे उसके शौहर का ग़ुस्सा भी ख़त्म हो गया।
इस दास्तान से नतीजा यह निकलता है कि जब भी दो लोगों में कहासुनी या झगड़ा हो जाए और दोनों में से कोई एक ख़ामोश रहे तो झगड़ा आगे बढ़ ही नहीं सकता।
हर हाल में शुक्र करने की आदत डाल लें
बीवी ही क्या अगर कोई भी अपनी ज़िंदगी के हर काम में या यूं कहा जाए हर समय और हर हाल में अपनी ज़ुबान पर और दिल में अल्लाह की हम्द और शुक्र रखे तो उसकी ज़ुबान ख़ुद ब ख़ुद बेहद मीठी हो जाएगी और न बीवी का शौहर से झगड़ा होगा और न ही किसी का किसी दूसरे से। शौहर घर में कैसी भी चीज़ें लाए उसका दिल रखने के लिए शुक्रिया ज़रूर अदा करे, हर चीज़ को शुक्र का चश्मा लगा कर देखे तो बुराईयां छिप जाएंगी और अच्छाईयां आपके सामने आएंगी।
पैग़म्बर स.अ. ने एक बार औरतों से ख़ेताब करते हुए कहा कि मैंने जहन्नम में सबसे ज़्यादा औरतों को देखा है, जब आपसे वजह पूछी गई तो आपने फ़रमाया कि उनकी अपने शौहर की ना शुकरी की वजह से।
अपने ग़ुस्से पर क़ाबू रखें
ज़्यादातर झगड़ों की बुनियाद ग़ुस्सा है।
अगर ग़ुस्से पर क़ाबू करने के तरीक़ों पर अमल कर के ग़ुस्से पर कंट्रोल कर लिया जाए तो झगड़े की बुनियाद ही ख़त्म हो जाएगी और जब झगड़े की बुनियाद ख़त्म हो जाएगी तो झगड़ा और तकरार भी नहीं होगी जिसका नतीजा ज़िंदगी में ख़ुशहाली होगी। और अगर कभी शौहर की किसी बात पर बीवी को बहुत ज़्यादा ग़ुस्सा आ जाए तो वह यह सोचे कि उस पर भी अल्लाह के बहुत सारे हुक़ूक़ हैं और उससे भी अल्लाह के हुक़ूक़ अदा करने में कमी होती रहती है जब वह आपको माफ़ करता रहता है तो आपको भी चाहिए कि शौहर को माफ़ करती रहें, शौहर की ग़लतियों को इस तरह नज़रअंदाज़ करती रहे जिस तरह अल्लाह आपकी ग़लतियों को नज़रअंदाज़ करता है।
शौहर जब ग़ुस्से में हो तो जवाब न दें
अगर घर के माहौल को बेहतर बनाना चाहती है तो बीवी को शौहर की ग़लती के समय और उसके ग़ुस्सा करने के समय भी अपनी ज़ुबान न चलाए और उस समय ख़ामोश रहे, और जब शौहर का ग़ुस्सा उतर जाए तब कहे कि उस समय तो मैं ख़ामोश थी आपके सम्मान में नहीं बोली लेकिन अब कह रही हूं कि आप उस समय ग़लत थे, आपका ग़ुस्सा जाएज़ नहीं था, आप पहले मुझसे पूछ लेते ते बेहतर होता, आप तो आए और बस डांटना शुरू कर दिया, आपकी इस बात से मुझे तकलीफ़ हुई....
इस तरह नर्म और आराम से बात करने से बात कभी आगे नहीं बढ़ेगी और शौहर के दिल में बीवी की समझदारी, होशियारी और नेक रवैया बैठ जाएगा और उसकी निगाह में बीवी की इज़्ज़त और मर्तबा बढ़ेगा। इसके अलावा उलमा ने ग़ुस्से के समय अऊज़ो बिल्लाह पढ़ कर पानी पीने जैसा नुस्ख़ा बताया है, या शौहर और बच्चों के घर में आते समय अऊज़ो बिल्लाह, बिस्मिल्लाह और सूरए तौहीद उसके बाद सलवात पढ़ने को बताया है जिससे शैतान का घर में दाख़िला भी रुक जाएगा, जिसका नतीजा यह होगा कि वह घर दूसरे फ़ायदों के साथ साथ लड़ाई झगड़े से भी महफ़ूज़ रहेगा।
ग़ुस्से के कंट्रोल का एक और इलाज वुज़ू भी है, या अगर इंसान ग़ुस्से की हालत में खड़ा है तो बैठ जाए, पानी पी ले या वुज़ू कर ले तो ग़ुस्सा तुरंत ख़त्म या कम हो जाता है।
राज़ न खोलें
बीवी शौहर के सामने अपने घर वालों या रिश्तेदारों के राज़ न खोले, क्योंकि इमाम अली अ.स. की हदीस नहजुल बलाग़ा में है कि तुम्हारा राज़ तुम्हारा क़ैदी है और जैसे ही आपने उसे किसी के सामने बयान किया उसके बाद आप उस राज़ के क़ैदी हो जाते हैं।
मुमकिन है कि उस राज़ में कोई ऐसा पहलू पाया जाता हो जिसमें आपके घर वाले या रिश्तेदार का अपमान हो और आपका शौहर नाराज़गी और ग़ुस्से के समय उस राज़ को अपने घर वालें के सामने बयान कर दे। इसलिए राज़ की बातों को राज़ ही रहने दें ताकि लड़ाई झगड़े की बुनियाद ही न पड़ने पाए।
हर हाल में शौहर का साथ दें
नेक बीवी को चाहे ख़ुशी के हालात हों या दुख के, अमीरी हो या ग़रीबी हर हाल में शौहर का साथ देना चाहिए, ऐसा न हो मीठा मीठा हप हप और कड़वा कड़वा थू थू, जब पैसा था तो ख़ूब मोहब्बत और इज़्ज़त, जब पैसा नहीं रहा तो ठेने शुरू, अगर शौहर परेशान हो जॉब छूट गई हो या कारोबार ठप हो गया हो और फ़रमाईशें जारी रहें तो इसका मतलब होगा कि उस औरत ने शौहर के माल से शादी की थी, यानी उसका निकाह उसके शौहर से नहीं माल से हुआ था।
ऐसे मौक़े पर एक नेक और शरीफ़ बीवी का फ़रीज़ा है कि उसके ग़म का पसीना पोछे और तसल्ली दे कि आप फ़िक्र न करें जिस अल्लाह ने वापस लिया है वह दोबारा किसी और रास्ते से देगा, यक़ीनन उसके वापस लेने में उसकी कोई हिकमत होगी, आप नमाज़ों की पाबंदी करें और परेशान होने के बजाए उससे दुआ करें हम इंशा अल्लाह क़नाअत से बसर गुज़र कर लेंगे।
इंसाफ़ से बताईए जब शौहर यह बातें सुनेगा तो उसका दिल कितना मज़बूत होगा, यक़ीनन उसको इन परेशानियों में नया रास्ता सुझाई देगा, उसका ग़म ख़ुशी में बदलता नज़र आएगा, लेकिन अगर ताने और शिकायत का सिलसिला जारी रहा तो घर में लड़ाई झगड़ा होते हुए और घर का माहौल ख़राब होने में देर न लगेगी।
ना महरमों से दूरी
हर मोमिना के लिए ज़रूरी है कि ना महरम मर्द से चाहे क़रीबी रिश्तेदार ही क्यों न हो उससे ज़्यादा बातें करने, हंसी मज़ाक़ करने, उनको घरों में बिठाने, उनसे बे तकल्लुफ़ होने, शौहर के दोस्तों से बिना किसी ज़रूरत के मुलाक़ात करने से ऐसे बचें जैसे शेर या सांप से बचा जाता है। याद रखिए जो एक कनीज़ी को क़ुबूल नहीं करती उसे दर दर की नौकरानी बनना पड़ता है, यानी जो औरतें बिना हेजाब और पर्दे के या ग़ैर शरई तरीक़ों से बाहर निकलती हैं और अल्लाह के हुक्म को नहीं मानतीं आप यह न समझें कि वह आज़ाद हैं, इसी तरह मर्द भी है एक ग़ुलामी उसे हज़ारों ग़ुलामियों से बचा लेती है।
आप किसी बे हेजाब औरत से पूछें कि वह पर्दा क्यों नहीं करती, तो वह कहेगी कि समाज की वजह से, रिश्तेदारों की वजह से, ख़ानदान में पर्दे का चलन न होने की वजह से....
इसका मतलब यह हुआ कि वह अल्लाह की ग़ुलामी छोड़ कर समाज की ग़ुलामी क़ुबूल कर चुकी है। हालांकि दुनिया में कोई भी क़ैद से बाहर नहीं है, कोई अल्लाह की क़ैद में है तो कोई शैतान की, कोई नफ़्स की क़ैद में है तो कोई समाज की, अब फ़ैसला आपको करना है कि आपको किसकी क़ैद में रहना है।
जब तक नाराज़ शौहर को राज़ी न कर लें आराम से न बैठें
जब तक नाराज़ शौहर को राज़ी न कर लें आराम से न बैठें, क्योंकि पैग़म्बर स.अ. असहाब के बीच बेहतरीन औरतों की सिफ़त बयान करते हुए फ़रमाते हैं कि उनमें से एक औरत वह है कि जब कभी उससे शौहर को कोई तकलीफ़ पहुंचे या वह उससे नाराज़ हो तो वह उससे माफ़ी मांगने के लिए उसके पास आए और उसका हाठ पकड़ कर कहे कि ख़ुदा की क़सम जब तक आप मुझसे राज़ी या ख़ुश न होंगे मेरी आंखें नींद से दूर रहेंगी........, अगर मियां बीवी में किसी तरह की नाराज़गी, ग़ुस्सा गर्मी और अनबन हो जाए तो नेक बीवी को माफ़ी मांगने में पहल करनी चाहिए, उसके नेक होने की पहचान यह है कि वह जब तक अपने नाराज़ शौहर को राज़ी न कर ले तब तक चैन से न बैठे। इसलिए कि दिलों में अनबन अल्लाह की रहमत से दूर कर देती है, मुसीबतों और परेशानियों को घेर कर लाती है, ऐसी ऐसी तरफ़ से परेशानियां आती हैं कि उसके बारे में सोचा तक नहीं जा सकता, इसलिए हर मोमिन और मोमिना ख़ास कर शौहर और बीवी को कभी एक दूसरे से दिल में अनबन नहीं रखना चाहिए जिसकी दुआ की तरफ़ क़ुर्आन ने सूरए हश्र आयत न. 10 में इशारा किया है। नाराज़गी का इलाज जल्दी इसलिए ज़रूरी है कि अगर शौहर और बीवी में नाराज़गी बढ़ती गई तो मुमकिन है यही नाराज़दी रंजिश में बदल जाए और यह लड़ाई और नाराज़गी दो लोगों से निकल कर ख़ानादानों तक पहुंच जाए, जिसका नतीजा उन दोनों की औलादों की तबाही के साथ साथ कई ख़ानदान भी तबाह होंगे।
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