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Date of publication : 18/11/2018 18:34
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आयतुल्लाह फ़ाज़िल लंकरानी र.ह. की ज़िंदगी पर एक निगाह

आप अपनी मेहनत और क़ाबिलियत की वजह से केवल 25 साल की उम्र में इज्तेहाद के दर्जे तक पहुंच गए, और आपको यह मक़ाम आपके उस्ताद आयतुल्लाह बुरूजर्दी की पुष्टि से हासिल हुआ।

विलायत पोर्टल :  आप ईरान के मुक़द्दस शहर क़ुम में पैदा हुए, आपके वालिद मशहूर आलिम और हौज़ए इल्मिया क़ुम के बेहतरीन उस्ताद थे और आपकी वालिदा रिज़वी सादात थीं।
इल्मी क़ाबिलियत
आपने केवल 13 साल की उम्र में बेसिक शिक्षा पूरी कर ली और फिर उच्च शिक्षा के लिए हौज़ए इल्मिया क़ुम आ गए, आप अपनी असामान्य मानसिक क्षमताओं की वजह से केवल 6 साल में हौज़े की शुरूआती तालीम हासिल करने में कामयाब हो गए और फिर केवल 19 साल की उम्र में आयतुल्लाह बुरूजर्दी र.ह. के ख़ारिज के दर्स में शामिल हो गए और अपनी कम उम्र में ज़हीन होने की वजह से दूसरे तालिब इल्मों के बीच भी काफ़ी मशहूर हो गए थे, जिस समय हौज़े में आप उच्च शिक्षा हासिल कर रहे थे उस समय इमाम ख़ुमैनी र.ह. के बेटे शहीद हुज्जतुल इस्लाम मुस्तफ़ा ख़ुमैनी आपके साथियों में थे।
आपके उस्ताद
आप 11 साल तक आयतुल्लाह बुरूजर्दी र.ह. के फ़िक़्ह और उसूल के दर्से ख़ारिज में जाते रहे और 9 साल इमाम ख़ुमैनी र.ह. के ख़ारिज के दर्स में शामिल रहे, इस तरह से आपने इन दो अज़ीम हस्तियों से इल्म को हासिल किया, आप अपनी मेहनत और क़ाबिलियत की वजह से केवल 25 साल की उम्र में इज्तेहाद के दर्जे तक पहुंच गए, और आपको यह मक़ाम आपके उस्ताद आयतुल्लाह बुरूजर्दी की पुष्टि से हासिल हुआ।
आपके दर्स
आप सालों साल तक क़ुम में उच्च शिक्षा हासिल करने वाले तालिब इल्मों की तरबियत करते रहे और 25 साल से ज़्यादा आपने फ़िक़्ह उसूल और दूसरे विषय का दर्स दिया, आपके क़ुम के दर्स में 700 से ज़्यादा उलमा शामिल होते थे, कई सालों तक आपके दर्स को ईरान के नेशनल टीवी से टेलीकॉस्ट भी किया गया जिसकी वजह से दूसरे शहरों और देशों में रहने वाले उलमा भी आपके दर्स से भरपूर फ़ायदा हासिल करते थे।
शाह की हुकूमत के ख़िलाफ़ आपकी सियासी गतिविधियां
इमाम ख़ुमैनी र.ह ने शाह की मनहूस और ज़ालिम हुकूमत के भयानक ज़ुल्म के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाई तो आपने उस इस्लामी तहरीक का खुल कर साथ दिया, आपने इस्लामी इंक़ेलाब को क़ायम करने की कोशिश में हर उस आवाज़ का साथ दिया जो शाह के ख़िलाफ़ उठी और इस तरह आप इस्लामी इंक़ेलाब में अहम किरदार निभाते रहे, आप हौज़-ए-इल्मिया के बुज़ुर्ग उलमा की सबसे उच्च कमेटी जामिआ-ए-मुदर्रेसीन के कई साल तक अहम रुक्न रहे, इस्लामी इंक़ेलाब के मिशन को आगे बढ़ाने, मुसलमानों की बेदारी और इमाम ख़ुमैनी र.ह. की मरजईयत और लीडरशिप के समर्थन में खुल कर बयान देते रहे, आपकी यह गतिविधियां शाह और उसके चमचों को लगातार खटकती रहीं इसीलिए शाह की हुकूमत की ख़ुफ़िया पुलिस, सावाक ने आपको प्रताड़ित करना और तकलीफ़ देना शुरू कर दिया लेकिन आपने अपनी राजनीतिक गतिविधियां और इंक़ेलाब की राह में कोशिशों को और तेज़ कर दिया जिसके कारण आपको एक बंदरगाह के क़रीब जिलावतन कर दिया गया, चार महीने के बाद आपको वहां से ले जाकर ढ़ाई साल तक यज़्द शहर में रहने पर मजबूर किया गया, इस्लामी इंक़ेलाब की कामयाबी के बाद आप इमाम ख़ुमैनी र.ह. के एक अहम, मज़बूत और क़रीबी मददगारों में रहे, और इमाम ख़ुमैनी र.ह. की वफ़ात के बाद आप इस्लामी इंक़ेलाब के रहबर और इमाम ख़ुमैनी र.ह. के जानशीन आयतुल्लाह ख़ामेनई के भी अहम हामियों में थे।
अहलेबैत अ.स. से ख़ास लगाव
हमेशा से आपका ख़ानदान अहलेबैत अ.स. के ख़ास अक़ीदतमंदों में से रहा है, आज भी साल भर आपके दफ़्तर में अहलेबैत अ.स. ख़ास कर इमाम हुसैन अ.स. की अज़ादारी का सिलसिला जारी रहता है, हर जुमे को साथ ही इमामों की विलादत और शहादत पर आपके घर पर मजलिसों और महफ़िलों का दौर जारी रहता है। जमाअत की ज़िम्मेदारी
अहलेबैत अ.स. से बेहद इश्क़ और मोहब्बत की वजह से आपको यह सआदत हासिल रही कि क़ुम जैसे मुक़द्दस शहर में ज़ाकेरीन और उलमा के एक अहम सेंटर आक़ा सैय्यद हसन नामी इमामबाड़े में जमाअत की नमाज़ की ज़िम्मेदारी कई साल तक निभाते रहे और फिर आयतुल्लाह मरअशी नजफ़ी र.ह. की वफ़ात के बाद क़ुम में उलमा के निवेदन और हज़रत मासूमा स.अ. के हरम के मुतवल्ली की लिखित दावत पर आपने इस मुक़द्दस जगह पर जमाअत पढ़ाने की ज़िम्मेदारी क़ुबूल की जिसकी वजह से रोज़ाना हज़ारों उलमा और ज़ायरीन सातवें इमाम हज़रत इमाम मूसा काज़िम अ.स. की बेटी हज़रत मासूमा स.अ. के हरम में आपकी इमामत में जमाअत से नमाज़ अदा करते रहे।
आपकी मरजईयत
इमाम ख़ुमैनी र.ह. की वफ़ात के बाद मोमेनीन ने दीनी अहकाम आपसे पूछना शुरू कर दिया और आयतुल्लाह अराकी र.ह. के इंतेक़ाल के बाद जामिआ-ए-मुदर्रेसीन हौज़-ए-इल्मिया क़ुम ने आपको मराजे की लिस्ट में सबसे पहले स्थान पर होने की हैसियत से पहचनवाया।
आपकी किताबें आपने उलमा की तरबियत के साथ बहुस सारी यादगार किताबें अरबी और फ़ारसी ज़ुबान में लिखी हैं जिनमें से कुछ अहम किताबों के नाम हम यहां पर पेश कर रहे हैं....
** तफ़सीलुश-शरीयह, यह किताब अरबी ज़ुबान में आपने लिखी और यह इमाम ख़ुमैनी र.ह. की किताब तहरीरुल वसीला की शरह है जिसकी कई जिल्दें हैं।
** मशहूर किताब उरवतुल वुस्क़ा पर हाशिए के तौर पर लिखी जाने वाली किताब, यह भी अरबी ज़ुबान में रखी गई है।
** निहायतुत-तक़रीर, यह किताब भी अरबी ज़ुबान में लिखी गई है, और यह किताब आयतुल्लाह बुरूजर्दी से पूछे गए नमाज़ से संबंधित सवालों के जवाब पर आधारित है।
** अल-सौम (अरबी)
** अल-क़ज़ा (अरबी)
** अल-मसाएलुल-मुसतहदेसा (अरबी)
इसके अलावा भी आपने दर्जनों किताबें अरबी और फ़ारसी ज़ुबान में लिखी जिससे आज भी उलमा फ़ायदा हासिल कर रहे हैं।
(यह आर्टिकल आयतुल्लाह फ़ाज़िल लंकरानी की वेबसाइट से लेकर तर्जुमा किया गया है।)
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