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Code : 196734
Date of publication : 1/12/2018 6:54
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हज़रत फ़ातिमा मासूमा स.अ. के क़ुम आने की वजह

पूरा अलवी ख़ानदान दूसरी और तीसरी शताब्दी में बनी उमय्या और बनी अब्बास के ज़ुल्म और अत्याचार का शिकार था, कुछ बादशाहों जैसे मंसूर दवानेक़ी और मुतवक्किल जैसों ने इमाम अली अ.स. के ख़ानदान से दुश्मनी की सारी हदें पार कर रखी थीं, इसीलिए जब भी आले अली अ.स. को मौक़ा मिलता था वह हिजरत कर जाते थे ताकि जान भी महफ़ूज़ रह सके और साथ ही अहलेबबैत अ.स. की वह तालीमात जिन्हें बनी उमय्या लोगों तक नहीं पहुंचने दे रही है उनको लोगों तक पहुंचाया जा सके।
विलायत पोर्टल :  इतिहासकारों ने हज़रत फ़ातिमा मासूमा स.अ. के ईरान तशरीफ़ लाने के पीछे कई राज़ बयान किए हैं, कुछ का कहना है कि आपके ईरान आने की वजह ईरानी क़ौम का आले अली अ.स. से मोहब्बत थी, कुछ का कहना है कि जब पैग़म्बर स.अ. के ख़ानदान वालों का उनके अपने शहर मदीना में जीना मुश्किल कर दिया गया तो उन्होंने दूसरे इलाक़ों की तरफ़ हिजरत शुरू की, कुछ का कहना है कि जब ईरान के लोगों ने इमाम अली अ.स. की विलायत को क़ुबूल करते हुए उनके ख़ानदान से मोहब्बत ज़ाहिर की और विलायत के प्रचार के लिए हर तरह से कोशिश की यहां तक कि जान माल की क़ुर्बानी पेश की तो अलवियों ने अपनी जान की हिफ़ाज़त के लिए ईरान का रुख़ किया।
हिजरत के राज़
हज़रत मासूमा स.अ. भी दूसरे अलवियों की तरह पूरी सूझ बूझ के साथ और मंसूबा बंदी के तहत मदीना से ईरान तशरीफ़ लाईं, कुछ लोग कहते हैं कि चूंकि इमाम रज़ा अ.स. और हज़रत मासूमा स.अ. की मां एक थीं इसलिए दोनों भाई बहनों में बेहद मोहब्बत थी इसीलिए भाई की मोहब्बत उन्हें ईरान ले आई....।
बेशक इस्लाम में मोहब्बत, जज़्बात और भावनाओं की बहुत अहमियत है लेकिन फिर भी आपकी इस हिजरत को केवल जज़्बात और भावनाओं के आधार पर कहना मुनासिब नहीं है, बल्कि उनकी हिजरत क़ुर्आन की आयतों और हदीसों की रौशनी में इस्लामी तालीमात और दीनी विचारधारा को फैलाने के लिए भी थी, और उस दौर के ज़ालिम बादशाहों के ख़िलाफ़ आपका यह एक बहुत मज़बूत क़दम था और अलवी ख़ानदान का महफ़ूज़ रहना भी इसी हिजरत में छिपा हुआ है, इसके अलावा और भी बहुत सारे कारण और बहुत सारी वजहें हैं जो इस हिजरत में छिपे हुए हैं।
तारीख़े मज़हबीए क़ुम के लेखक ने अलवियों के ईरान आने के पीछे तीन राज़ बयान किए हैं..
1- क़ुम, इमाम अली अ.स. के चाहने वालों की बस्ती थी और यहां इमाम अली अ.स. के ख़ानदान के लिए अमन और शांति थी जबकि दूसरे बहुत से शहरों में आले अली अ.स. कठिन परिस्तिथियों से गुज़र रहे थे और उस दौर के हालात इतने ख़राब थे कि आले अली अ.स. को क़त्ल किया जा रहा था इसलिए उन्होंने ईरान की ओर हिजरत की।
2- क़ुम की ज़मीन को अहलेबैत अ.स. ने आले मोहम्मद अ.स. के लिए पनाहगाह जैसे शब्दों से याद किया है और इस राज़ को अलवी और क़ुम के रहने वाले जानते थे इसलिए अलवियों ने क़ुम का सफ़र किया और क़ुम की तरफ़ हिजरत कर के तशरीफ़ लाए।
3- पूरा अलवी ख़ानदान दूसरी और तीसरी शताब्दी में बनी उमय्या और बनी अब्बास के ज़ुल्म और अत्याचार का शिकार था, कुछ बादशाहों जैसे मंसूर दवानेक़ी और मुतवक्किल जैसों ने इमाम अली अ.स. के ख़ानदान से दुश्मनी की सारी हदें पार कर रखी थीं, इसीलिए जब भी आले अली अ.स. को मौक़ा मिलता था वह हिजरत कर जाते थे ताकि जान भी महफ़ूज़ रह सके और साथ ही अहलेबबैत अ.स. की वह तालीमात जिन्हें बनी उमय्या लोगों तक नहीं पहुंचने दे रही है उनको लोगों तक पहुंचाया जा सके।
इतिहासकारों ने हज़रत फ़ातिमा मासूमा स.अ. के ईरान तशरीफ़ लाने के पीछे कई राज़ बयान किए हैं जिनमें से कुछ को हम यहां बयान कर रहे हैं....
ईरानी शियों के अक़ीदे की मज़बूती
ईरानी लोगों ने तौहीद और नबुव्वत का पैग़ाम सुन कर उस पर लब्बैक कहा और फिर पूरे पूरे शहर इस्लाम क़ुबूल करने लगे, और इस्लाम को नुक़सान पहुंचाने वालों के ख़िलाफ़ बहुत सारी जंग भी की, उनका अक़ीदा इतना मज़बूत था कि उसके लिए अपनी जान और अपने माल को क़ुर्बान करने के लिए तैयार रहते थे, जब आले अली अ.स. ने उनकी अक़ीदत और मोहब्बत को देखा तो उसको सरहाते हुए उनके शहर की तरफ़ हिजरत की।
ईरान का इतिहास और वहां का वातावरण
ईरान और उसके शहर क़ुम का ख़ास इतिहास रहा है, और मुक़द्दस शहर क़ुम के सिलसिले में मासूमीन अ.स. से हदीसें भी मौजूद हैं जिनको सारे अरब और अरबवासियों ने आले अली अ.स. से सुना था, और उसके अलावा ईरान का वातावरण और वहां की हवा पानी ज़िंदगी गुज़ारने के लिए बहुत उचित थी और शायद यही वजह है कि हज़रत मासूमा स.अ. और दूसरी बहुत सारे इमामों की औलाद क़ुम तशरीफ़ लाईं।
क़ुम का अमन और शांति
क़ुम शहर दूसरे देशों और शहरों को देखते हुए इमाम अली अ.स. के ख़ानदान के लिए ज़्यादा सुरक्षित था, कुछ लोगों ने लिखा है कि आले अली अ.स. ने क़ुम की तरफ़ इसलिए हिजरत की ताकि बनी उमय्या और बनी अब्बास के ज़ालिम बादशाहों और हाकिमों से मुक़ाबला कर सकें, और क़ुम में मौजूद इमाम अ.स. के चाहने वालों ने भी इस्लाम को फैलाने की ख़ातिर ख़ुद को तैयार कर रखा था और इस्लाम के परचम तले अपनी जान और अपने माल को क़ुर्बान करने के लिए तैयार थे। इमाम रज़ा अ.स. की हिजरत
हज़रत मासूमा स.अ. के ईरान हिजरत करने के पीछे एक अहम राज़ इमाम रज़ा अ.स. की हिजरत थी और इमाम रज़ा अ.स. नबुव्वत के घराने के आठवें जानशीन थे इसलिए उनके चाहने वाले उनसे मिलने के लिए ईरान आया करते थे ताकि दीनी और दुनियावी सवालों को उनकी ख़िदमत में पेश कर सकें।
हज़रत मासूमा स.अ. के क़ुम आने की अलग अलग वजहें इतिहास ने बयान की हैं लेकिन एक चीज़ जो यक़ीनी है वह यह कि सन् 200 हिजरी में इमाम रज़ा अ.स. को ख़ुरासान (ईरान) आने पर मजबूर किया गया और मामून ने उनको उत्तराधिकारी बनाने के लिए बुलाया, कुछ लोगों ने समझा कि अब मामून इमाम अ.स. को अपना जानशीन बना देगा, और जब यह ख़बर पूरे मदीने में फैली तो इमाम अ.स. के चाहने वाले ईरान की तरफ़ चल दिए और उनमें से एक हज़रत मासूमा स.अ. भी थीं जिन्होने अपने भाई से मुलाक़ात करने और साथ ही दीनी मआरिफ़ को लोगों तक पहुंचाने के लिए मदीने से ईरान की तरफ़ हिजरत की।
** इसके अलावा यह भी कहा गया है कि मदीने से निकलते समय इमाम रज़ा अ.स. ने अपनी शहादत की ख़बर दी थी और इमाम अ.स. लोगों से इस तरह मिल रहे थे जैसे अब मदीने वापसी नहीं होगी, और यही बात वजह बनी कि इमाम रज़ा अ.स. के बाद हज़रत मासूमा स.अ. ने भी हिजरत की।
तारीख़े क़ुम, हसन इब्ने मोहम्मद इब्ने हसन साएब इब्ने मालिक अशअरी क़ुम्मी
तारीख़े मज़हबी क़ुम, अली असग़र फ़िक़ही
बिहारुल अनवार, अल्लामा मजलिसी
करीमए अलहेबैत अ.स., महदवीपूर
हज़रत मासूमा स.अ. फ़ातिमा-ए-दुव्वम, मोहम्मद मोहम्मदी इश्तेहारदी
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