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Date of publication : 2/12/2018 18:24
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सऊदी अरब को यमन के लोगों में इस्लामी बेदारी का डर

सऊदी अरब यमन के लोगों में इस्लामी बेदारी से डरा हुआ है और उसके हमलों और उसके ज़ुल्म का मक़सद यमन के तेल की मैदानों पर क़ब्ज़ा करना है।अमेरिका हमेशा अपने आपको मानवाधिकारों का हितैषी और आतंकवाद का विरोधी कहता है लेकिन सऊदी अरब द्वारा यमन पर ज़ुल्म और अत्याचार करने में उसका खुला समर्थन रहा है और उससे क़रीबी संबंध भी बनाए हुए हैअमेरिका, यमन में दाइश और अलक़ायदा का खुलेआम समर्थन कर रहा है।

विलायत पोर्टल :  इमाम रज़ा अ.स. के हरम की न्यूज़ एजेंसी की रिपोर्ट के अनुसार, कालेब मौपिन ने इमाम रज़ा अ.स. के हरम में जवानों के मीटिंग हाल में शिक्षा और सांस्कृति के क्षेत्र में सक्रिय रहने वालों की मीटिंग में कहा कि सऊदी अरब, यमन के सिलसिले में अमेरिका और इस्राईल की साज़िश को आगे बढ़ा रहा है।
उसने सऊदी अरब द्वारा यमन में ज़ुल्म, बे गुनाह लोगों के क़त्लेआम और सैन्य ठिकानों के अलावा सार्वजनिक स्थानों पर हमले की तरफ़ इशारा करते हुए कहा, अब तक सऊदी अरब के हमलों और ज़ुल्म से लाखों लोग ज़ख्मी और हज़ारों मारे जा चुके हैं, और सऊदी अरब द्वारा हत्या का यह आंकड़ा बढ़ता ही जा रहा है। इस अमेरिकी राजनीतिक एक्सपर्ट ने इन हादसों पर अफ़सोस ज़ाहिर करते हुए कहा, मुझे एक अमेरिकी होने के नाते इस बात पर बहुत अफ़सोस और शर्मिंदगी है कि सऊदी अमेरिकी हथियारों और अमेरिका की मदद से ऐसा कर रहा है।
सऊदी अरब द्वारा यमन पर हमलों को अमेरिका का समर्थन
कालेब मौपिन ने ज़ोर देते हुए कहा कि सऊदी अरब के यमन पर वहशी हमलों में पूरी तरह से अमेरिका की ओर से मदद हो रही है, और वह जंगी विमान जो यमन के रिहायशी इलाक़ों पर बमबारी कर रहे हैं उनका ईंधन और सारी ज़रूरत का सामान अमेरिका उपलब्ध करा रहा है।
इस अमेरिकी राजनीतिक एक्सपर्ट ने याद दिलाया कि सऊदी अरब अपने सारे हथियारों को केवल अमेरिका से ख़रीदता है और यमन को बर्बाद करने में कोरोड़ों डॉलर ख़र्च कर रहा है।
दुनिया को चाहिए कि यमन में चल रहे नस्लीय सफाए को रोके
उसने इस बात पर भी ज़ोर दिया कि सभी देशों को सऊदी द्वारा यमन पर होने वाले हमलों का विरोध करना चाहिए और उसे रोकना चाहिए और अब इससे ज़्यादा यमन में नस्लकुशी की अनुमति नहीं देना चाहिए।

इस अमेरिकी बुध्दिजीवी ने ईरान की तरफ़ से यमन की ओर जाने वाली खाने पीने के सामान से भरी कश्ती के बारे में कहा कि ईरान बेगुनाह और मज़लूम लोगों की मदद कर रहा है लेकिन अफ़सोस है कि यमन में सऊदी सेना और आत्मघाती हमला करने वाले लोगों की वजह से वह इस मुहिम में बहुत ज़्यादा कामयाब नहीं हो पा रहा है, उसने कहा कि जिस दिन ईरान की दोस्ती और सुलह की कश्ती यमन के किनारे पर पहुंची सऊदी अरब की ओर से उस बंदरगाह पर 8 बार बमबारी की गई और सीरिया के 15 लोग जो मदद करने आए थे उन्हें गिरफ़्तार कर लिया गया।
उसने ईरान के लोगों को मज़लूमों का समर्थन और उनकी मदद करने के मामले में दुनिया के सबसे बहादुर लोग बताते हुए कहा कि ईरान के लोग केवल यमन के लोगों की ही मदद के लिए नहीं बल्कि दुनिया के किसी कोने में भी मदद की ज़रूरत हो वह हाज़िर रहते हैं।
कालेब मौपिन ने सऊदी अरब के यमन पर हमला करने के मक़सद को बताते हुए कहा कि सऊदी अरब यमन के लोगों में इस्लामी बेदारी से डरा हुआ है और उसके हमलों और उसके ज़ुल्म का मक़सद यमन के तेल की मैदानों पर क़ब्ज़ा करना है। उसने कहा कि अमेरिका और सऊदी अरब, यमन से एक स्वतंत्र देश होने से डरते हैं और हमेशा इसी कोशिश में रहते हैं कि किसी तरह यह देश फ़क़ीर हो कर पीछे रह जाए। इस अमेरिकी राजनीतिक विशेषज्ञ ने सऊदी अरब को उन देशों में से बताया जो मानवाधिकार और क़ौमों के बारे में अपना कोई मक़सद और आइडिया नहीं रखते हैं।
उसने कहा कि इस देश में ज़ुल्म एक क़ानून है और आज तक सऊदी अरब में चुनाव नहीं हुए।
अमेरिका मानवाधिकार का झूठा दावेदार
इस अमेरिकी राजनीतिक विशेषज्ञ ने कहा कि अमेरिका हमेशा अपने आपको मानवाधिकारों का हितैषी और आतंकवाद का विरोधी कहता है लेकिन सऊदी अरब द्वारा यमन पर ज़ुल्म और अत्याचार करने में उसका खुला समर्थन रहा है और उससे क़रीबी संबंध भी बनाए हुए है। ईरान की ओर से यमनवासियों के लिए राहत सामाग्री ले जाने वाले जहाज़ में मौजूद रहे अमेरिका के इस राजनीतिक एक्सपर्ट के इस बयान ने अमेरिका, इस्राईल, सऊदी अरब और दाइश को एक ही लाइन में खड़ा करते हुए कहा कि अमेरिका, यमन में दाइश और अलक़ायदा का खुलेआम समर्थन कर रहा है।

उसने कहा कि हम इस समय बहुत ही संवेदनशील परिस्थिति से गुज़र रहे हैं, संयुक्त राष्ट्र संघ यमन के लोगों के साथ बातचीत कर रहा है और यमनवासी अपनी पूरी ताक़त के साथ सऊदी अरब के ऐसे ज़ुल्म का मुक़ाबला कर रहे हैं जिसको देख कर हर कोई हैरान है पर बोलने की हिम्मत कोई भी देश नहीं कर रहा।
कालेब मौपिन ने अपने बयान के एक हिस्से में अमेरिका की ओर से लीबिया, इराक़ और अफ़ग़ानिस्तान पर हमले के बाद सामने आने वाले नतीजे की ओर इशारा करते हुए कहा कि वह सारे देश जिन पर अमेरिका ने हमले किए हैं और वहीं की सरकारों को बदला है उससे न केवल किसी तरह की कोई तरक़्क़ी नहीं हुई बल्कि वहां का अमन और शांति और वहां मौजूद तरक़्क़ी भी ख़त्म हो चुकी है।
मानवाधिकार का समर्थक ईरान है
राजनीतिक मामलों के इस विशेषज्ञ ने इस्लामी रिपब्लिक ईरान को मानवाधिकार का समर्थक बताते हुए कहा कि पूंजीपति देश इस कोशिश में हैं कि बलपूर्वक सारे देशों के मामलात में दख़ल दें और वह इस काम को किसी भी क़ीमत पर करने को तैयार हैं, चाहे लोगों की जान से खेल कर ही क्यों न हो।
वह कहता है कि मालदार देशों और क्मयूनिज़्म (साम्यवाद) के बीच किसी तरह का मतभेद नहीं रहा, बल्कि 21वीं शताब्दी मालदार देशों और उसके विरोधियों के बीच मतभेद का दौर है, इसकी बेहतरीन मिसाल अवैध राष्ट्र इस्राईल है जो पूरी दुनिया पर अपना क़ब्ज़ा जमाना चाहता है। अमेरिका के जवान यह बात समझ चुके हैं कि ईरान अमेरिका के लोगों का दुश्मन नहीं है बल्कि ईरान पूंजीपति सिस्टम और ज़ालिम हुकूमत का विरोधी है।
अमेरिकन लोग ईरान से मधुर संबंध चाहते हैं
वह कहता है कि अमेरिका के लोग ईरान और अमेरिका के बीच अच्छे संबंध की कोशिश में हैं और केवल कुछ एजेंसियां, पूंजीपति और हथियारों के दलाल और इस्राईल के समर्थक लोग अमेरिका और इस्लामिक रिपब्लिक ईरान के बीच अच्छे संबंध न होने की कोशिश में हैं। इस अमेरिकी बुध्दिजीवी ने पश्चिमी मीडिया द्वारा गढ़े गए मिथक की ओर इशारा करते हुए कहा कि पश्चिमी देशों के लोगों को सारी घटनाओं की जानकारी नहीं है और वहां की मीडिया इस ज़ुल्म और नस्लीय सफाए को शिया सुन्नी जंग का रूप दे कर पेश कर रहा है।
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