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Date of publication : 5/12/2018 18:34
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बच्चे की तरबियत में मां का किरदार

इमाम अली अ.स. अपने बेटे इमाम हसन अ.स. को वसीयत करते हुए फ़रमाते हैं कि, बेशक बच्चे का दिल ख़ाली ज़मीन की तरह होता है कि जिस में जो बीज डाला जाए वह ज़मीन उसे अपने सीने में रख लेती है, इसलिए इससे पहले कि तुम्हारा दिल सख़्त हो जाए मैंने तुम्हें अदब और तहज़ीब सिखाने में जल्दी की।

विलायत पोर्टल : अल्लाह की दी हुई नेमतों में से एक नेमत औलाद है, जो मां बाप के लिए आंख के तारे की हैसियत रखती है, वालेदैन अपनी औलाद के लिए सब कुछ क़ुर्बान करने को तैयार रहते हैं, औलाद के हवाले से वालेदैन की ज़िम्मेदारियों में से एक ज़िम्मेदारी उनकी तरबियत है, बच्चे एक नन्हे पौधे कि तरह होते हैं जिसे गर्मी, सर्दी और बरसात से बचा कर एक पेड़ की शक्ल तक पहुंचाना होता है।
तरबियत इंसानी समाज में एक ऐसी ज़रूरत है जिसकी ज़रूरत को दुनिया की सारी क़ौमों में महसूस किया जा सकता है, यही वजह है कि हर क़ौम और सारे वालेदैन की कोशिश होती है कि अपने बच्चों को बचपन से ही तहज़ीब, अदब, कल्चर और सही रस्म व रिवाज की तालीम दी जाए ताकि वह ख़ुद भी एक अच्छा इंसान बन सके और उन सारी चीज़ों को आने वाली नस्लों तक पहुंचा सके, इमाम अली अ.स. अपने बेटे इमाम हसन अ.स. को वसीयत करते हुए फ़रमाते हैं कि, बेशक बच्चे का दिल ख़ाली ज़मीन की तरह होता है कि जिस में जो बीज डाला जाए वह ज़मीन उसे अपने सीने में रख लेती है, इसलिए इससे पहले कि तुम्हारा दिल सख़्त हो जाए मैंने तुम्हें अदब और तहज़ीब सिखाने में जल्दी की। (नहजुल बलाग़ा, ख़त न. 31)
आपकी इस बात से यह बात साफ़ हो जाती है कि इससे पहले कि बच्चा दूसरी बातों की ओर अपने ध्यान को ले जाए उसके ध्यान को तालीम और तरबियत की तरफ़ मोड़ देना चाहिए। जो भी अपनी औलाद की अच्छी तरबियत करना चाहता है उसमें ख़ुद भी उन्हीं सिफ़ात का पाया जाना ज़रूरी है वरना वह सही तरीक़े से तरबियत नहीं कर पाएगा, लेकिन हम देखते हैं कि मां की शख़्सियत बच्चों को ज़्यादा प्रभावित करती है क्योंकि बच्चे की पैदाइश का शुरूआती दौर मां से संबंधित है, यही वजह है कि जब हम रिवायतों पर ध्यान देते हैं तो हमें बहुत सी हदीसें नज़र आती हैं जिनमें शारीरिक संबंध बनाने और पेट में बच्चे के आने के आदाब बयान किए गए हैं, जिनमें उन बातों का ज़िक्र किया गया है जिसका सीधा संबंध बच्चे की तरबियत से है, पेट में बच्चा आ जाने के बाद जितना मां एहतियात करेगी उतना ही बच्चा अख़लाक़ और सआदत की राह पर आगे बढ़ेगा और वह माएं जो इन बातों पर ध्यान नहीं देती हैं या कम ध्यान देती हैं उनकी औलाद के बिगड़ने के चांस उतने ही ज़्यादा होते हैं।
यही वजह है कि इमाम सादिक़ अ.स. की इस हदीस, ज़्यादा ख़ैर और बरकत औरतों में है (मन ला यहज़ोरोहुल फ़क़ीह, शैख़ सदूक़ र.ह., जिल्द 3, पेज 385) से यह नतीजा निकाला जा सकता है कि किसी भी समाज में मोजूद लोगों की तरबियत करने वाली अहम शख़्सियत का नाम औरत है, अगर एक नेक औरत अपनी औलाद की अच्छी तरबियत करती है तो कल वही औलाद समाज में सकारात्मक किरदार अदा करती है जिसके नतीजे में समाज की तरक़्क़ी के चांस बढ़ जाते हैं, इसलिए कहा जा सकता है कि किसी भी समाज की तरक़्क़ी का राज़ केवल इसी बात में है कि समाज की औरतें अपने बच्चों की अच्छी और नेक तरबियत करें।
इतिहास में इसकी बहुत सारी मिसालें मिलती हैं, जिनमें से एक एडिसन की शख़्सियत है, एडिसन के टीचर ने उसके बारे में उसकी मां से कहा था कि आपका बच्चा मानसिक रूप से पिछड़ा हुआ और कमज़ोर है, लेकिन एडिसन की मां ने उस टीचर की बात का इंकार करते हुए कहा कि मेरा बच्चा मानसिक रूप से इतना आगे और मज़बूत है कि आप उसे समझ नहीं सके, इसके बाद उसकी मां उसे घर ले आई और शुरूआती तालीम ख़ुद ही घर पर दी, जब उसकी मां उसे तालीम देती तो वह बहुत ध्यान से सुनता था और यही वजह हुई कि वह नौ साल की उम्र में अहम किताबों को पढ़ चुका था, एडिसन तीन महीसे से ज़्यादा स्कूल नहीं गया उसने जो कुछ सीखा अपनी मां से सीखा, मां की बेहतरीन तरबियत के नतीजे में एडिसन ने साइंस में अहम चीज़ें ईजाद कीं जिनमें से एक बिजली का बल्ब भी है।
बच्चे की तरबियत उसी समय शुरू हो जाती है जब वह मां के पेट में परवरिश पा रहा होता है, मां के अच्छे किरदार, तक़वा, परहेज़गारी और दूसरे अख़लाक़ी पहलू बच्चे की शख़्सियत पर सीधा असर डालते हैं, अगर मां पेट में बच्चा होने के समय क़ुर्आन की तिलावत करती है या क़ुर्आन की तिलावत सुनती है तो इस बात की संभावना बहुत बढ़ जाती है कि बच्चा क़ुर्आन का हाफ़िज़ हो जाए, जैसे सय्यद मोहम्मद हुसैन तबातबाई की मिसाल हमारे सामने है, इसी तरह अगर मां हराम और हलाल खाने का ध्यान रखे तो उसका असर भी बच्चे के अख़लाक़ और तरबियत पर पड़ता है।
मां के किरदार की अहमियत को हम इमाम हसन मुज्तबा अ.स. की इस दास्तान से अच्छी तरह से समझ सकते हैं, जब इमाम हसन अ.स. ने माविया से मुनाज़ेरा करते हुए उसके हक़ को छोड़कर गुमराही और अख़लाक़ी पस्ती की तरफ़ जाने और अपनी सआदत और ख़ुश क़िस्मती की एक वजह औलाद की तरबियत में मां के किरदार की तरफ़ इशारा करते हुए फ़रमाते हैं, ऐ माविया क्योंकि तुम्हारी मां हिन्द और दादी नुसैला है इसीलिए तुम इतने बुरे और ग़ैर अख़लाक़ी आमाल अंजाम दे रहे हो जबकि मेरे ख़ानदान की सआदत ऐसी माओं की गोद में तरबियत पाने की वजह से है जो हज़रत ख़दीजा स.अ. और हज़रत फ़ातिमा ज़हरा स.अ. जैसी मोमिना और तक़वा वाली पाक ख़ातून थीं। (अल-एहतेजाज, अल्लामा तबरिसी, जिल्द 1, पेज 282)
इमाम हसन अ.स. के इस मुबारक फ़रमान ने अपने हसब और नसब पर गर्व किया है और यह समझाना चाहा है कि हमारे दुश्मनों की नजासत ख़ानदानी है जो उनको उनके बुज़ुर्गों से मीरास में मिली है, लेकिन हम अल्लाह के अहकाम और इस्लामी अख़लाक़ और तालीमात पर अमल करने वाले लोग हैं और हमने यह अपने बुज़ुर्गों से मीरास में हासिल किया है।
बच्चा पैदा होने के बाद जिससे सबसे ज़्यादा क़रीब रहता है वह मां होती है, शरई हुक्म यह है कि मां बच्चे को दो साल तक दूध पिलाए, अगर मां इस दौरान भी अख़लाक़ी वैल्यूज़ की पाबंदी करे तो इसका असर भी बच्चे पर सकारात्मक पड़ता है, दूध पिलाते समय बा वुज़ू होना, अल्लाह का ज़िक्र करते रहना वग़ैरह वग़ैरह यह सब बच्चे के किरदार को नेक बनाने में अहम रोल अदा कर सकते हैं, बच्चा पहली बार कोई शब्द बोलता है वह भी ज़्यादातर मां ही के सिखाए हुए होते हैं, इसी तरह बच्चे को अच्छे अख़लाक़ की तरबियत, बात करने का सही अंदाज़, इस्लामी आदाब की तालीम, बुज़ुर्गों से मिलने और उनके सम्मान का तरीक़ा और इस तरह की बहुत सारी बातें बच्चा मां की गोद से सीखता है और मां की यह तरबियत बच्चे की ज़िंदगी में वही (وحی) की हैसियत रखती है जो उसे बुढ़ापे तक याद रहती है, सारी बातों का नतीजा यह है कि अगर एक इंसान को समाज के लिए सकारात्मक और फ़ायदेमंद बनाना है तो उसमें मां का किरदार बाप के किरदार से बहुत ज़्यादा असर रखता है, इसलिए हर मां को अपनी दीनी, अख़लाक़ी और समाजी ज़िम्मेदारी समझते हुए बच्चे की तरबियत जैसे विषय को गंभीरता से लेना चाहिए। ................................


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