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Date of publication : 9/12/2018 18:7
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क़ुर्आन की तिलावत की फ़ज़ीलत और उसका सवाब

पैग़म्बर स.अ. फ़रमाते हैं कि जिसने क़ुर्आन के केवल एक हर्फ़ की तिलावत की उसके आमालनामे में एक नेकी लिखी जाती है और हर नेकी का दस गुना सवाब मिलता है, फिर आपने फ़रमाया, मैं यह नहीं कहता कि अलिफ़ लाम मीम यह हर्फ़ है बल्कि अलिफ़ एक हर्फ़ है लाम दूसरा हर्फ़ है और मीम तीसरा हर्फ़ है
विलायत पोर्टल :  क़ुर्आन वह आसमानी क़ानून है जो लोगों की दुनिया और आख़ेरत में सआदत और कामयाबी की ज़िम्मेदारी लेता है, क़ुर्आन की हर आयत हिदायत का स्रोत और अल्लाह की रहमत की खान है, जो भी हमेशा बाक़ी रहने वाली सआदत और दीन और दुनिया की कामयाबी की आरज़ू रखता है उसे दिन रात क़ुर्आन से अहद कर लेना चाहिए, उसकी आयतों को अपने दिमाग़ में बसा ले और उन्हें अपनी फ़िक्र और विचारों में शामिल कर ले ताकि हमेशा की कामयाबी और कभी ख़त्म न होने वाले व्यापार की तरफ़ क़दम बढ़ा सके।
क़ुर्आन की तिलावत की फ़ज़ीलत और उसके सवाब के सिलसिले में पैग़म्बर स.अ. और मासूमीन अ.स. से बहुत सारी हदीसें नक़्ल हुई हैं, जैसाकि एक हदीस में इमाम बाक़िर अ.स. फ़रमाते हैं कि पैग़म्बर स.अ. ने फ़रमाया, जो शख़्स रात में दस आयतों की तिलावत करे उसका नाम ग़ाफ़िलों (जो अल्लाह की याद से दूर हो जाते हैं) में नहीं लिखा जाएगा और जो शख़्स पचास आयतों की तिलावत करे उसका नाम ज़ाकेरीन (अल्लाह का ज़िक्र करने वालों और हराम व हलाल का ख़्याल रखने वालों) में लिखा जाएगा और जो शख़्स सौ आयतों की तिलावत करे उसका नाम क़ानेतीन (इबादत करने वालों) में लिखा जाएगा और जो शख़्स दो सौ आयतों की तिलावत करे उसका नाम ख़ाशेईन (अल्लाह के सामने ख़ुज़ूअ (विनम्रता) से पेश आने वालों) में लिखा जाएगा और जो शख़्स तीन सौ आयतों की तिलावत करे उसका नाम सआदत हासिल करने वालों में लिखा जाएगा और जो शख़्स पांच सौ आयतों की तिलावत करे उसका नाम हर समय अल्लाह की इबादत की कोशिश में रहने वालों में लिखा जाएगा और जो शख़्स हज़ार आयतों की तिलावत करे वह ऐसा है जैसे उसने बहुत बड़ी तादाद में सोना अल्लाह की राह में दे दिया हो।
इमाम सादिक़ अ.स. फ़रमाते हैं क़ुर्आन अल्लाह की तरफ़ से एक अहद है, मुसलमान को अपने अहदनामे Testament को ध्यान से पढ़ना चाहिए और रोज़ाना पचास आयतों की तिलावत करनी चाहिए।
आपने यह भी फ़रमाया कि जब तुम्हारे व्यापारी व्यापार से निपट कर घर वापस आते हैं तो सोने से पहले एक सूरे की तिलावत करने से उन्हें कौन सी चीज़ रोक देती है... (यानी वह क्यों तिलावत नहीं करते), ताकि हर आयत के बदले उसके लिए दस नेकियां लिखी जाएं और उसके आमालनामे से दस बुराईयां मिटाई जाएं।
फिर आप फ़रमाते हैं कि क़ुर्आन की तिलावत ज़रूर किया करो इसलिए कि क़ुर्आन की आयतों की तिलवात के हिसाब से ही जन्नत में दर्जे दिए जाएंगे, जब क़यामत का दिन होगा और क़ुर्आन की तिलावत करने वाले से कहा जाएगा कि क़ुर्आन पढ़ते जाओ और अपने दरजात बुलंद करते जाओ फिर वह जैसे जैसे क़ुर्आन की तिलावत करेगा उसके दरजात बुलंद होते जाएंगे।
हदीस की किताबों में उलमा ने इस विषय पर बहुत सी हदीसें जमा की हैं और बिहारुल अनवार की उन्नीसवीं जिल्द में इस विषय पर बहुत हदीसें मौजूद हैं उनमें से कुछ हदीसों के मुताबिक़ क़ुर्आन देख कर तिलावत करना ज़ुबानी तिलावत करने से बेहतर है।
उनमें से एक हदीस यह है कि इसहाक़ इब्ने अम्मार ने इमाम सादिक़ अ.स. से कहा कि मेरी जान आप पर क़ुर्बान हो मैंने क़ुर्आन हिफ़्ज़ कर लिया है और अब ज़ुबानी ही तिलावत करता हूं, यही बेहतर है या क़ुर्आन देख कर तिलावत करूं.....,
आपने फ़रमाया, क़ुर्आन देख कर तिलावत करना बेहतर है, क्या तुम्हें नहीं मालूम कि क़ुर्आन की तरफ़ देखना इबादत है, जो शख़्स क़ुर्आन में देख कर तिलावत करे उसकी आंख ख़ुशी का एहसास करती है और उसके वालेदैन के अज़ाब में कमी कर दी जाती है चाहे वह काफ़िर ही क्यों न हों।
** क़ुर्आन में देख कर तिलावत करने की ताकीद के लिए कुछ बातों की तरफ़ ध्यान ज़रूरी है, क़ुर्आन में देख कर तिलावत करने की ताकीद इसलिए की गई है ताकि ऐसा न हो कि क़ुर्आन की तिलावत हिफ़्ज़ से करने की वजह से क़ुर्आन को धीरे धीरे किनारे कर दिया जाए और उसमें तहरीफ़ हो जाए या उसको लोगों के बीच से ग़ायब ही कर दिया जाए।
** दूसरी वजह यह है कि क़ुर्आन में देख कर तिलावत करने के बहुत से असर हैं जिनको हदीसों में बयान किया गया है, जैसाकि इमाम अ.स. ने फ़रमाया देख कर क़ुर्आन पढ़ने वाले की आंखें अंधेपन और आंखों की बीमारी से महफ़ूज़ रहती हैं या यह कि देख कर क़ुर्आन की तिलावत करने से बहुत सारे क़ुर्आनी राज़ का इल्म इंसान को हासिल होता है, क्योंकि इंसान की निगाह जब किसी ऐसी चीज़ पर पड़ती है जिसे वह पसंद करता हो तो उसका नफ़्स ख़ुश होता है और वह अपनी आंखों और बसीरत में रौशनी महसूस करता है, क़ुर्आन में लिखे लफ़्ज़ पर जब तिलावत करने वाले की निगाह पड़ती है और वह उसके मानी और मतलब पर ध्यान देता है तो वह अपने अंदर इल्म और जागरुकता को महसूस करता है और उसकी रूह सुकून का एहसास करती है।
** कुछ हदीसों में घर के अंदर तिलावत करने की फ़ज़ीलत बयान की गई है उसका राज़ क़ुर्आन की तबलीग़ और क़ुर्आन की तिलावत का ज़िक्र है क्योंकि जब इंसान अपने घर के अंदर क़ुर्आन की तिलावत करे तो उसकी बीवी बच्चे भी क़ुर्आन की तिलावत करते हैं उससे यह अमल लोगों के बीच बढ़ता रहता है, लेकिन अगर क़ुर्आन की तिलावत किसी ख़ास जगह पर अकेले की जाए तो उसका फ़ायदा उस शख़्स के अलावा दूसरा हासिल नहीं कर पाता और हर जगह यह फ़ज़ीलत केवल ख़ास बन कर रह जाती है।
शायद घरों में तिलावत की एक वजह यह भी हो कि इससे अल्लाह की निशानियां ज़िंदा रहती हैं क्योंकि जब सुबह शाम घरों से तिलावत की आवाज़ बुलंद होगी तो सुनने वालों की निगाह में इस्लाम की अहमियत बढ़ेगी इसलिए जब शहर के कोने कोने से क़ुर्आन की तिलावत की आवाज़ सुनाई देगी तो सुनने वालों पर एक तरह का दबदबा क़ायम रहेगा।
घरों में तिलावत का असर
वह घर जिसमें क़ुर्आन की तिलावत और अल्लाह का ज़िक्र किया जाता हो उसकी बरकतें बढ़ जाती हैं उसमें फ़रिश्ते नाज़िल होते हैं, शैतान उस घर को छोड़ देता है और वह घर जिसमें तिलावत होती है वह फरिश्तों को ऐसे रौशन और नूरानी दिखाई देते हैं जिस तरह आसमान के सितारे ज़मीन वालों को रौशनी देते हैं, और वह घर जिनमें तिलावत नहीं होती और अल्लाह का ज़िक्र नहीं होता उसमें बरकत कम होती है और फ़रिश्ते उसे छोड़ देते हैं और उनमें शैतानों का बसेरा हो जाता है। हदीसों में क़ुर्आन की फ़ज़ीलत और वह सम्मान और इज़्ज़त जिसे अल्लाह तिलावत करने वाले को देता है इतना ज़्यादा ज़िक्र हुआ है कि इंसान की अक़्ल हैरत में पड़ जाती है....
पैग़म्बर स.अ. फ़रमाते हैं कि जिसने क़ुर्आन के केवल एक हर्फ़ की तिलावत की उसके आमालनामे में एक नेकी लिखी जाती है और हर नेकी का दस गुना सवाब मिलता है, फिर आपने फ़रमाया, मैं यह नहीं कहता कि अलिफ़ लाम मीम यह हर्फ़ है बल्कि अलिफ़ एक हर्फ़ है लाम दूसरा हर्फ़ है और मीम तीसरा हर्फ़ है।
इस हदीस को अहले सुन्नत रावियों ने भी नक़्ल किया है, जैसाकि क़ुरतुबी ने अपनी तफ़सीर में तिरमिज़ी से और उन्होंने इब्ने मसऊद से नक़्ल किया है, कुलैनी र.ह. ने भी लगभग इसी जैसी हदीस इमाम सादिक़ अ.स. से नक़्ल की है।
इसके अलावा और भी सैकड़ों हदीसें क़ुर्आन की तिलावत का सवाब बयान करती हैं, ध्यान रहे आज हमारे बीच तेज़ी से फैलने वाली बुराईयों की एक एहम वजह क़ुर्आन से दूरी है, हम भूल चुके हैं कि क़ुर्आन हमारे लिए ही नाज़िल हुआ है, उसके अहकाम उसकी हिदायत के नुस्ख़े हमारे लिए ही हैं, और अगर ऐसा ही रहा तो याद रहे कि यही क़ुर्आन क़यामत के दिन अल्लाह के सामने शिकायत करेगा और उस समय हमारे पास हाथ मलने के अलावा कोई चारा नहीं होगा।
क़ुर्आन की तालीमात पर अमल न करने का ही नतीजा है जिसके चलते आज मुसलमानों के किरदार और रवैये पर दूसरे लोग उंगली उठाते हैं, जबकि इंसान को इंसान बनाने का क़ुर्आन से मज़बूत नुस्ख़ा किसी दीन के पास नहीं है, इसलिए याद रखिए जिस तरह क़ुर्आन की शफ़ाअत अल्लाह की बारगाह में क़ुबूल है उसी तरह उसकी शिकायत पर भी अल्लाह माफ़ करने वाला नहीं है।
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