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Date of publication : 10/12/2018 18:5
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वालेदैन के हक़ में दुआ

ऐ अल्लाह, अगर तूने उन्हें मुझसे पहले बख़्श दिया तो उन्हें मेरी शफ़ाअत करने वाला क़रार दे, और मुझे पहले बख़्श दिया तो मुझे उनका शफ़ीअ क़रार दे ताकि हम सब तेरे करम के सदक़े में और तेरी बुज़ुर्गी, रहमत और बख़्शिश वाले घर में एक साथ जमा हो सकें, यक़ीनन तू बड़े फ़ज़्ल वाला, क़दीम एहसान वाला और सब रहम करने वालों में सबसे ज़्यादा रहम करने वाला है।
विलायत पोर्टल :  इमाम सज्जाद अ.स. की दुआ की वह किताब जिसे सहीफ़-ए-सज्जादिया के नाम से पहचाना जाता है, यह किताब मआरिफ़ और इस्लामी तालीमात का वह ख़ज़ाना है जिसमें इमाम सज्जाद अ.स. की वह दुआएं हैं जिन्हें आपने ऐसे दौर में अपने शागिर्दों को तालीम फ़रमाई जब बनी उमय्या का ज़ुल्म अपनी चरम सीमा को पार कर चुका था, एक तरफ़ पैग़म्बर स.अ. के नवासे का ख़ून बनी उमय्या द्वारा बहाया जा चुका था तो दूसरी तरफ़ इन्हीं ख़बीसों द्वारा काबे पर हमला भी हो चुका था, यह वह दौर था जिसमें किसी की इमाम अ.स. से कुछ भी पूछने की हिम्मत तक नहीं होती थी, ऐसे माहौल में इमाम अ.स. ने दुआओं के ज़रिए सारे मुसलमानों ख़ास कर अपने चाहने वालों तक बहुस सारे दीनी मआरिफ़ और इस्लामी तालीमात को पहुंचाया, इस किताब में अल्लाह की अज़मत, बंदे का अल्लाह से, औलाद का वालेदैन और वालेदैन का औलाद से रिश्ता, एक दूसरे के हुक़ूक़, नबियों के सिफ़ात, क़यामत का ज़िक्र और भी सैकड़ों दीनी और इस्लामी मआरिफ़ मौजूद हैं।
इन्हीं मआरिफ़ में से एक वालेदैन के हक़ में दुआ करना है जिसे इमाम अ.स. ने अल्लाह की बारगाह में पेश कर के हम सभी को यह सलीक़ा सिखाया कि किस तरह अल्लाह से अपने वालेदैन के हक़ में दुआ करनी चाहिए....., उसी दुआ के तर्जुमे को हम इस लेख में बयान कर रहे हैं।
ऐ अल्लाह अपने ख़ास बंदे पैग़म्बर स.अ. और उनके पाकीज़ा अहलेबैत अ.स. पर रहमत नाज़िल फ़रमा और उन्हें बेहतरीन रहमत, बरकत और दुरूद व सलाम के साथ विशेष सम्मान अता कर।
ऐ माबूद मेरे मां बाप को भी अपने नज़दीक इज़्ज़त और करामत और ख़ास रहमत इनायत फ़रमा, ऐ सब रहम करने वालों से ज़्यादा रहम करने वाले।
ऐ अल्लाह, मोहम्मद और उनकी आल पर रहमत नाज़िल फ़रमा और उनके जो हुक़ूक़ मुझ पर वाजिब हैं उनका इल्हाम द्वारा मुझे इल्म अता कर, और सभी वाजिब अहकाम का इल्म बिना कम और ज़्यादा हुए मुझे अता फ़रमा, और फिर जिन चीज़ों का मुझे इल्म अता किया हो उस पर अमल का पाबंद बना दे, मुझे अता की हुई इल्मी सूझबूझ पर अमल करने की तौफ़ीक़ दे ताकि उन सारी बातों में से जिनको तूने मुझे सिखाया है कोई बिना अमल के रह न जाए और उस ख़िदमत से जो तूने मुझे बताई है मेरे हाथ पैर थकन महसूस न करें।
ऐ अल्लाह, मोहम्मद स.अ. और उनकी आल अ.स. पर रहमत नाज़िल फ़रमा क्योंकि तूने उनसे निसबत दे कर हमें शरफ़ बख़्शा है, मोहम्मद स.अ. और उनकी आल अ.स. पर रहमत नाज़िल फ़रमा क्योंकि तूने उनकी वजह से हमारा हक़ अपनी मख़लूक़ात पर क़ायम किया है।
ऐ अल्लाह, मुझे ऐसा बना दे कि मैं इन दोनों से इस तरह डरूं जिस तरह किसी ज़ालिम बादशाह से डरा जाता है, और इस तरह उनके साथ मेहरबान रहूं जिस तरह एक मां अपनी औलाद के साथ मेहरबान रहती है, उनकी इताअत और उनके साथ अच्छे अख़लाक़ से पेश आने को मेरी नींद भरी आंखों के लिए नींद से ज़्यादा मज़ेदार क़रार दे ताकि मैं पानी के घूंट पर भी उनकी ख़्वाहिश को अपनी पहली पसंद क़रार दे सकूं और अपनी हर ख़ुशी से पहले उनकी ख़ुशी को हासिल कर सकूं और उनके थोड़े एहसान को ज़्यादा समझ सकूं, और मैं चाहे जितनी बड़ी नेकी उनके साथ क्यों न करूं लेकिन उसे कम ही समझूं।
ऐ अल्लाह, मेरी आवाज़ को उनके सामने नीचा, मेरी बातों को उनके लिए नेक, मेरी तबीयत को उनके लिए नर्म और मेरे दिल को उनके लिए मेहरबान बना दे, और मुझे उनके साथ नर्मी और मोहब्बत से पेश आने वाला क़रार दे।
ऐ अल्लाह, उन्हें मेरी परवरिश करने के लिए नेक अज्र दे और मेरी नेक तरबियत करने के लिए सवाब अता कर और कमसिनी में मेरी देखभाल का सिला दे।
ऐ अल्लाह, उन्हें मेरी तरफ़ से अगर कोई तकलीफ़ पहुंची हो या मेरी तरफ़ से अगर कोई नाख़ुश कर देने वाली बात हुई हो या उनके हक़ में कमी रह गई हो तो उसे उनके गुनाहों का कफ़्फ़ारा, उनके दरजात में बुलंदी और उनकी नेकियां ज़्यादा होने का ज़रिया क़रार दे।
ऐ बुराईयों को कई गुना ज़्यादा नेकियों में बदलने वाले अल्लाह, अगर उन्होंने मेरे साथ बात करने में सख़्ती या किसी काम में बुरा सुलूक या मेरे किसी हक़ को अनदेखा किया हो या अपनी किसी ज़िम्मेदारी को पूरा करने में कमी की हो तो मैं उनको माफ़ करता हूं और उसे नेकी और एहसास का ज़रिया क़रार देता हूँ और परवरदिगारा तुझसे इल्तेजा करता हूं कि इन सब का हिसाब किताब उनसे मत करना।
ख़ुदाया, मैं अपनी तरफ़ से कोई बुरा ख़्याल नहीं रखता और ना ही अपनी तरबियत के सिलसिले में उन्हें कोई दोष देता हूं और ना ही उनकी देखभाल में कोई कमी निकालता हूं क्योंकि उनके हुक़ूक़ मुझ पर वाजिब हैं और मुझ उनके एहसान इससे कहीं ज़्यादा हैं, मैं उनकी नेकियों और एहसान का बदला दे ही नहीं सकता, और अगर ऐसा कर सकूं तो फिर ऐ मेरे अल्लाह उनका हर समय मेरी परवरिश में उलझे रहना, मेरी तरबियत के लिए तकलीफ़ें उठाना और ख़ुद परेशानियों में रह कर मेरे लिए आराम और आसानियों का इंतेज़ाम करना कहां जाएगा...... ?
क्या ऐसा हो सकता है कि वह अपने हुक़ूक़ का सिला मुझसे पा सकें.....?
ना मैं उनके हुक़ूक़ से ख़ुद को किनारे कर सकता हूं और ना ही उनकी ख़िदमत का फ़र्ज़ अदा कर सकता हूं, मोहम्मद स.अ. और उनकी आल अ.स. पर रहमत नाज़िल फ़रमा और मेरी मदद फ़रमा... ऐ उनमें से वह सबसे बेहतर जिनसे मदद मांगी जाती है मुझे तौफ़ीक़ अता कर।
ऐ उन सबसे ज़्यादा रहनुमाई करने वाले जिसकी तरफ़ सबसे ज़्यादा ध्यान दिया जाता है, जिस दिन हर इंसान को उसके आमाल का बदला दिया जाएगा और किसी पर ज़ुल्म न होगा उस दिन मुझे मां बाप की नाफ़रमान औलाद क़रार मत देना।
ऐ अल्लाह, मोहम्मद स.अ. और उनकी आल अ.स. पर रहमत नाज़िल फ़रमा और मेरे वालेदैन को उस अज्र से भी ज़्यादा अता कर जिसे तूने मोमिन बंदों के वालेदैन के लिए क़रार दिया है, ऐ रहम करने वालों में सबसे ज़्यादा रहम करने वाले।
ऐ अल्लाह उनकी याद को नमाज़ों के बाद रात की तंहाई और दिन के पूरे समय में किसी पल के लिए मेरे दिल से मत निकलने देना, ऐ अल्लाह, मोहम्मद स.अ. और उनकी आल अ.स. पर रहमत नाज़िल फ़रमा और मुझे उनके हक़ में दुआ करने की वजह से और उन्हें मेरे साथ नेकी करने से उनसे किसी भी तरह राज़ी फ़रमा, और उन्हें पूरे सम्मान और हिफ़ाज़त के साथ उनकी मंज़िलों तक पहुंचा दे।
ऐ अल्लाह, अगर तूने उन्हें मुझसे पहले बख़्श दिया तो उन्हें मेरी शफ़ाअत करने वाला क़रार दे, और मुझे पहले बख़्श दिया तो मुझे उनका शफ़ीअ क़रार दे ताकि हम सब तेरे करम के सदक़े में और तेरी बुज़ुर्गी, रहमत और बख़्शिश वाले घर में एक साथ जमा हो सकें, यक़ीनन तू बड़े फ़ज़्ल वाला, क़दीम एहसान वाला और सब रहम करने वालों में सबसे ज़्यादा रहम करने वाला है।
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