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Date of publication : 11/12/2018 17:11
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महिलाओं के अधिकार, इस्लाम और आधुनिक सभ्यता की निगाह में

इस्लाम ने महिलाओं के अधिकारों को विस्तार से बयान किया है, संपत्ति का अधिकार, माल ख़र्च करने का अधिकार, अपनी दौलत के इस्तेमाल का अधिकार, अपने माल से व्यापार कर के लाभ कमाने का अधिकार, इस्लामी हदों को ध्यान में रखते हुए जॉब करने का अधिकार, शिक्षा हासिल करने का अधिकार, सामाजिक और राजनीतिक मैदान में क़दम रखने का अधिकार वग़ैरह, यह वह अधिकार हैं जो इस्लाम ने महिलाओं को दिए हैं।
विलायत पोर्टल : दुनिया औद्योगिक और टैक्नोलॉजी क्रांति के बाद बहुत सारे बदलाव को देख चुकी है, इस क्रांति ने न केवल इंसान के भौतिक जीवन को बदल दिया बल्कि उसकी आदतों और उसके विचारों को भी बदल दिया, और आज ग्लोबलॉइज़ेशन जैसे विषय के सामने आने के बाद कुछ और बदलाव आने वाले हैं, जैसे समाज कल्याण की नाबूदी, राष्ट्रीय संस्कृति, दीन, रिवाज यहां तक कि राष्ट्रीय स्तर पर राजनीतिक और आर्थिक शासन की नाबूदी की बातें हो रही हैं।
आज की दुनिया का एक दावा यह भी है कि महिलाओं के अधिकारों को बदल दिया है तो अब देखना यह है कि वह बदलाव क्या हैं और महिलाओं के लिए किस हद तक फ़ायदेमंद हैं....,
पिछली शताब्दी के शुरूआती सालों में महिलाओं के मामलों पर विशेष ध्यान दिया गया और सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक विषय में यह मुद्दा बेहद ख़ास रहा, संयुक्त राष्ट्र संघ ने भी पिछली शताब्दी के आख़िरी सालों में औरतों के विषय पर चार मीटिंग कीं और इसी तरह 1975 को महिलाओं का साल क़रार दिया और उसके बाद बहुत सारी कांफ़्रेंस और बैठक महिलाओं के बारे में होने वाले भेदभाव को ख़त्म करने को लेकर हुईं।
एक सवाल जो यहां पर सामने आता है वह यह कि महिलाओं का विषय अंतर्राष्ट्रीय होने और उनके अधिकारों को औपचारिक और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर स्वीकार करने के बाद क्या उनकी हैसियत को बुलंदी मिली है और उनकी नई ज़िंदगी, तरक़्क़ी, रचनात्मकता और सामाजिक हालात में प्रभावित हुई है?
हक़ीक़त यह है कि नई तहज़ीब और नई संस्कृति भी महिलाओं के साथ होने वाले भेदभाव को नहीं ख़त्म कर सकी और महिलाओं को उनकी असली हैसियत नहीं दिला सकी, हाल में होने वाले हादसे और घटनाएं इस बात का सबूत हैं कि महिलाओं की असली तस्वीर में फेरबदल हुआ है और अपनी इंसानी पहचान और हैसियत को हासिल करने के लिए जूझ रही है, हालांकि इन सबके अलावा महिला के साथ भेदभाव और उसपर अत्याचार नए नए तरीक़ों से जारी है, कि जिनमें से कुछ का यहां ज़िक्र किया जा रहा है।
काम करने पर मजबूर करना
दुनिया में लगभग बारह मिलियन तीन लाख लोग काम करने पर मजबूर हैं जिनमें से 50 फ़ीसद से अधिक महिलाएं और लड़कियां हैं और 40 फ़ीसद 18 साल से कम उम्र के बच्चे हैं, इनमें से ज़्यादातर नौकर या खेती किसानी या मज़दूरी कर रहे हैं और दो मिलियन चार लाख लोग मानव तस्करी का शिकार हो जाते हैं। (अख़बारुस-सफ़ीर, लेबनान, 12-5-2005)
सेक्स और हवस के लिए इस्तेमाल
सेक्स के विषय के प्रचार के लिए महिलाओं का इस्तेमाल और उनको अशिष्टता और अपराध के लिए प्रोत्साहित करना, मिसाल के तौर पर यह बात ज़िक्र के क़ाबिल है कि स्वीडन के एक संस्थान के अनुसार 2004 में स्वीडन के लोगों ने चार मिलियन चार लाख डॉलर नशे और सेक्स एक्टिविटी पर ख़र्च किये हैं और अफ़सोस की बात यह है कि इस घटिया और नीच काम का विरोध करने की जगह उसे क़ानूनी शक्ल देने की कोशिश हो रही है। (अख़बारुन-नहार, बेरूत, 2-4-2005)
इंसानियत के लिए चुनौती, मर्दों को औरतों की ज़िम्मेदारी पूरी करना
महिलाएं, पुरुषों के रोल और किरदार निभाने में लगी हुई हैं, हालांकि उनकी तरबियत और परवरिश के लिए किसी रोल मॉडल को नहीं तलाश किया गया।
आज के नए कल्चर का यह दावा है कि औपचारिक या अनौपचारिक तौर पर वैवाहिक ज़िंदगी से हट कर भी मर्द और औरत एक साथ जिंदगी गुज़ार सकते हैं, जिसका नतीजा इंसानी नस्लों की बर्बादी है और पैदा हो चुके बच्चों में भावनाएं और हमदर्दी का ख़त्म होना है और इसी तरह मां बाप की मोहब्बत जैसे सुकून का कभी एहसास तक नहीं कर पाएंगे, और यह नस्ल न केवल नैतिक अपराध का शिकार होगी बल्कि पूरा परिवार और ख़ानदान प्रभावित होगा, समलैंगिकता को भी यूरोप ने वैवाहिक ज़िंदगी के मुक़ाबले में रखा है और अमेरिका और कुछ दूसरे देशों में इसे क़ानून की शक्ल दी जा चुकी है।
महिलाओं के सिलसिले में इस्लाम के विचार
पैदाइश और जिंदगी में औरत और मर्द की बराबरी
जेहालत के दौर में महिलाओं ने निराशा और अपमान को आख़िरी बार अपनी आंखों से देखा, हद तो यह थी कि दुश्मन की क़ैद में आकर अपनी इज़्ज़त के दाग़दार होने के डर से और आर्थिक फ़ायदा न होने की वजह से ज़िंदा दफ़्न कर दिया जाता था। {सूरए नहेल, आयत 58-59, सूरए इसरा, आयत 31}
इस्लाम ने अपने हमेशा बाक़ी रहने वाले पैग़ाम के मुताबिक़ जाहिलाना रस्मों का डट कर मुक़ाबला किया और सारी ना इंसाफ़ियों को ख़त्म कर के महिलाओं को सारे इंसानी अधिकार और सामाजिक वैल्यूज़ दिए और क़ुर्आन में जहां कहीं भी कोई हुक्म मर्दों के लिए बयान हुआ औरत को भी ध्यान में रखा गया है। (सूरए ज़िलज़ाल, आयत 7-8, सूरए तौबा, आयत 71, सूरए अहज़ाब, आयत 35)
सामाजिक और राजनीतिक अधिकारों में बराबरी
इस्लामी शरीयत ने महिलाओं के लिए बहुत सारे अधिकारों को ध्यान में रखा है उनमें से एक अपने लाइफ़ पार्टनर को चुनना है, इसीलिए इस्लामी क़ानून के मुताबिक़ अगर लड़की को किसी शख़्स के साथ शादी करने पर मजबूर कर दिया गया तो इस्लाम ने उस लड़की को निकाह बातिल करने (तोड़ने) का हक़ दिया है। (सूरए निसा, आयत 21)
इस्लाम ने महिलाओं के अधिकारों को विस्तार से बयान किया है, संपत्ति का अधिकार, माल ख़र्च करने का अधिकार, अपनी दौलत के इस्तेमाल का अधिकार, अपने माल से व्यापार कर के लाभ कमाने का अधिकार, इस्लामी हदों को ध्यान में रखते हुए जॉब करने का अधिकार, शिक्षा हासिल करने का अधिकार, सामाजिक और राजनीतिक मैदान में क़दम रखने का अधिकार वग़ैरह, यह वह अधिकार हैं जो इस्लाम ने महिलाओं को दिए हैं। (सूरए मुमतहेना, आयत 12)
इस्लाम के शुरूआती दिनों में हज़रत ख़दीजा स.अ. इस्लाम की पहली ख़ातून की राजनीतिक और सामाजिक गतिविधियां इसकी बेहतरीन दलील है। (बिहारुल अनवार, अल्लामा मजलिसी, जिल्द 16, पेज 11)
हज़रत ज़हरा स.अ. एक और बेहतरीन मिसाल हैं, जिन्होंने पैग़म्बर स.अ. की ज़िंदगी के बाद सामाजिक और राजनीतिक मैदान मे क़दम रख कर विलायत की रक्षा की और एक महिला की शक्ल में मुकम्मल इंसान की बेहतरीन मिसाल पेश की है।
इसी तरह आशूर के दिन इमाम हुसैन अ.स. की शहादत के बाद हज़रत ज़ैनब स.अ. का राजनीतिक और इंक़ेलाबी पैग़ाम को पहुँचाना और उस दौर के बादशाह का मुखौटा उतार का उसका क्रूर और पापी चेहरा सारी दुनिया के सामने लाना भी बेहतरीन दलील है जिसका कोई भी ईमानदार और इंसाफ़ पसंद करने वाला इंकार नहीं कर सकता।
मां बनने का सौभाग्य
एक महिला के लिए उसकी ज़िंदगी का सबसे बेहतरीन और सर्वोच्च सम्मान मां बनना है जो हर लड़की और महिला में फ़ितरी और नेचुरल तौर पर पाया जाता है और इंसानियत को बचाने का तरीक़ा भी यही है, क़ुर्आन ने बहुत सी जगहों पर मां का ज़िक्र किया है और वालेदैन के बारे में नसीहत की है। (सूरए लुक़मान, आयत 14, सूरए अहक़ाफ़, आयत 15, सूरए मरयम, आयत 32)
हज़रत ज़हरा स.अ. इसकी बेहतरीन मिसाल हैं जिन्होंने अनेक सामाजिक हालात का तजुर्बा करने और उन हालात में अनेक अहम किरदार अदा करने के अलावा अपनी मां होने की ज़िम्मेदारी को कभी नहीं भुलाया, और इमाम हसन अ.स., इमाम हुसैन अ.स., हज़रत ज़ैनब स.अ. और हज़रत उम्मे कुलसूम स.अ. जैसी शख़्सियतों की तरबियत की जो सारी इंसानियत के लिए मिसाल हैं।
आख़िर में अल्लाह से दुआ है कि हमारे समाज की महिलाओं को भी हज़रत ज़हरा स.अ. की सीरत पर चलने की तौफ़ीक़ अता फ़रमा।
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