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Date of publication : 18/12/2018 17:28
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हज़रत फ़ातिमा मासूमा स.अ.

इमाम सादिक़ अ.स. फ़रमाते हैं कि अल्लाह का एक हरम है जो मक्का में है, पैग़म्बर स.अ. का एक हरम है जो मदीना में है, इमाम अली अ.स. का एक हरम है जो कूफ़ा में है, और हम अहलेबैत अ.स. का भी एक हरम है जो क़ुम में है, और बहुत जल्द मेरी औलाद में से मूसा इब्ने जाफ़र अ.स. की बेटी क़ुम में दफ़्न होगी और उनकी शफ़ाअत के वसीले से हमारे शिया जन्नत में दाख़िल होंगे
विलायत पोर्टल : आप इमाम मूसा काज़िम अ.स. की बेटी और इमाम अली रज़ा अ.स. की बहन हैं, आपकी विलादत पहली ज़ीक़ादा 173 हिजरी और एक दूसरी रिवायत के मुताबिक़ 183 हिजरी को मदीना में हुई, आपकी मां का नाम नजमा ख़ातून और एक दूसरी रिवायत के मुताबिक़ ख़ैज़रान था, आप इमाम मूसा काज़िम अ.स. की सबसे बड़ी बेटी थीं, शैख़ अब्बास क़ुम्मी र.ह. लिखते हैं कि, इमाम मूसा काज़िम अ.स. की बेटियों में आप सबसे फ़ज़ीलत और कमाल वाली थीं जो मासूमा के नाम से मशहूर थीं, आपका नाम फ़ातिमा और मशहूर लक़ब मासूमा था, आपको यह लक़ब इमाम रज़ा अ.स. ने दिया था, आप बचपन से ही अपने बड़े भाई इमाम रज़ा अ.स. के बेहद क़रीब थीं और इमाम रज़ा अ.स. ही ने आपकी परवरिश की और इमाम रज़ा अ.स. ने आपको अपने इल्म और हिकमत की तालीम दी, आपकी फ़ज़ीलत के लिए यही काफ़ी है कि वक़्त के इमाम अ.स. ने आपके लिए तीन बार फ़रमाया कि तुम्हारा बाप तुम पर क़ुर्बान हो जाए।
कश्फ़ुल-लेयाली नाम की किताब में मौजूद है कि एक दिन अहलेबैत अ.स. के कुछ चाहने वाले मदीना आए, उनके पास कुछ सवाल थे जिनके जवाब वह इमाम मूसा काज़िम अ.स. से लेना चाहते थे, इमाम अ.स. किसी काम से शहर से बाहर गए हुए थे, उन लोगों ने अपने सवालों को लिख कर इमाम अ.स. के घर में दे दिए क्योंकि वह जल्द ही वापस जाना चाहते थे, हज़रत फ़ातिमा मासूमा स.अ. घर में मौजूद थीं, आपने उन सवालों को पढ़ा और उनके जवाब लिख कर उन्हें वापस कर दिया, वह लोग बहुत ख़ुश हुए और मदीने से वापस होने लगे, मदीने से बाहर निकलते हुए अचानक इमाम मूसा काज़िम अ.स. से मुलाक़ात हो गई, उन्होंने सारी दास्तान बयान की उसके बाद इमाम अ.स. ने उनके सवालों और हज़रत मासूमा स.अ. द्वारा दिए गए जवाबों को पढ़ा और बहुत ख़ुश हुए और तीन बार कहा कि तुम्हारे बाप तुम पर क़ुर्बान हो जाएं, उस समय आपकी उम्र बहुत कम थी इसलिए यह दास्तान आपके इल्म और फ़ज़्ल को बयान करती है।
आयतुल्लाह मरअशी नजफ़ी र.ह. अपने वालिद हाज सैयद महमूद मरअशी र.ह. से नक़्ल करते हैं कि हज़रत फ़ातिमा मासूमा स.अ. की क़ब्र अपनी मां हज़रत फ़ातिमा ज़हरा स.अ. की क़ब्र की निशानी है, उन्होंने हज़रत फ़ातिमा ज़हरा स.अ. की क़ब्र का पता लगाने के लिए एक अमल शुरू किया और यह अमल चालीस दिन तक चलता रहा और फिर चालीसवें दिन उन्हें इमाम बाक़िर अ.स. और इमाम सादिक़ अ.स. की ज़ियारत नसीब हुई, इमाम अ.स. ने उनसे फ़रमाया तुम करीम-ए-अहलेबैत अ.स. की पनाह हासिल करो, उन्होंने इमाम अ.स. से कहा कि मैंने यह चालीस दिन का अमल इसी लिए अंजाम दिया है ताकि हज़रत फ़ातिमा ज़हरा स.अ. की क़ब्र का पता जान सकूं और उनकी ज़ियारत कर सकूं, इमाम अ.स. ने फ़रमाया मेरी मुराद हज़रत फ़ातिमा मासूमा स.अ. की क़ब्र है, फिर फ़रमाया कि अल्लाह ने कुछ मसलहतों की वजह से हज़रत फ़ातिमा ज़हरा स.अ. की क़ब्र का पता और निशान छिपा कर रखा है।
इमाम रज़ा अ.स. का हुकूमत के ज़बर्दस्ती करने पर मर्व सफ़र करने के एक साल बाद 201 हिजरी में आप अपने भाईयों के साथ इमाम अली रज़ा अ.स. से मुलाक़ात और वक़्त के इमाम से दोबारा अहद करने की नीयत से सफ़र पर निकल पड़ीं और रास्ते में जब सावह पहुंचीं तो चूंकि वहां के लोग अहलेबैत अ.स. के दुश्मन थे इसलिए हुकूमत से मिल कर उन लोगों ने आप के क़ाफ़िले पर हमला कर दिया जिसके बाद आपके साथ आने वालों में से बहुत से लोग शहीद हो गए, आप अपने भाईयों के ग़म में बीमार हो गईं और सावह में आपको अपनी जान का ख़तरा महसूस होने लगा तो आपने फ़रमाया कि मुझे क़ुम ले चलो क्योंकि मैंने अपने बाबा से सुना है कि आप फ़रमाते थे कि क़ुम हमारे शियों का मरकज़ है, इस तरह आप वहां से क़ुम रवाना हो गईं, जब क़ुम के बुज़ुर्गों को यह ख़बर मिली वह बहुत ख़ुश हुए और आपके आने की ख़बर सुनते ही आपके इस्तेक़बाल में दौड़ पड़े, मूसा इब्ने ख़ज़रज अशअरी ने ऊंट की लगाम संभाली और हज़रत फ़ातिमा मासूमा स.अ. को क़ुम वाले पूरे सम्मान के साथ ले कर आए।
हज़रत फ़ातिमा मासूमा अ.स. ने 17 दिनों तक इस शहर में ज़िंदगी गुज़ारी और इन दिनों में आपने सारा समय अल्लाह की इबादत में गुज़ारा और अल्लाह से राज़ व नियाज़ करती रहीं और इस तरह ज़िंदगी के आख़िरी दिन बड़ी विनम्रता से गुज़ारे, आज जिस जगह आपका हरम है उस दौर में बाबलाम के नाम से यह जगह जानी जाती थी, और इस जगह पर मूसा इब्ने ख़ज़रज का एक बाग़ था, हज़रत फ़ातिमा मासूमा स.अ. की वफ़ात या एक रिवायत के हिसाब से शहादत के बाद आपको ग़ुस्ल दिया गया, कफ़न पहनाया गया और फिर उन्हें उसी जगह लाया गया जहां आज उनकी क़ब्र है, आले साद ने क़ब्र तैयार की, अब सवाल यह पैदा हुआ कि आपको क़ब्र में कौन उतारे...., आख़िरकार यह तय पाया कि एक मुत्तक़ी सैयद जो वहीं मौजूद थे वह आपके पाक जिस्म को क़ब्र में उतारेंगे, जैसे ही लोग उनसे कहने जा रहे थे अचानक दो लोगों को घोड़े पर सवार हो कर आते हुए देखा जिनके चेहरे पर नक़ाब पड़ा हुआ था, वह आए और जनाज़े की नमाज़ पढ़ने के बाद हज़रत फ़ातिमा मासूमा स.अ. को दफ़्न कर के चले गए, कोई यह भी नहीं जान सका कि वह कौन लोग थे, उसके बाद मूसा इब्ने ख़ज़रज ने क़ब्र के ऊपर कपड़े की छत तैयार की, जब इमाम मोहम्मद तक़ी अ.स. के बेटी हज़रत ज़ैनब अ.स. क़ुम तशरीफ़ लाईं तब उन्होंने हज़रत मासूमा स.अ. की क़ब्र पर मज़ार बनवाया, कुछ उलमा का कहना है कि नक़ाब में आने वाले लोग इमाम अली रज़ा अ.स. और इमाम मोहम्मद तक़ी अ.स. थे।
इमाम अली रज़ा अ.स. फ़रमाते हैं कि जिसने क़ुम में हज़रत मासूमा स.अ. की ज़ियारत की उसने मेरी ज़ियारत की, हज़रत फ़ातिमा मासूमा स.अ. की ज़ियारत की फ़ज़ीलत के बारे में मासूमीन अ.स. से बहुत सारी हदीसें नक़्ल हुई हैं, इमाम सादिक़ अ.स. फ़रमाते हैं कि अल्लाह का एक हरम है जो मक्का में है, पैग़म्बर स.अ. का एक हरम है जो मदीना में है, इमाम अली अ.स. का एक हरम है जो कूफ़ा में है, और हम अहलेबैत अ.स. का भी एक हरम है जो क़ुम में है, और बहुत जल्द मेरी औलाद में से मूसा इब्ने जाफ़र अ.स. की बेटी क़ुम में दफ़्न होगी और उनकी शफ़ाअत के वसीले से हमारे शिया जन्नत में दाख़िल होंगे, एक और हदीस के मुताबिक़ आपकी ज़ियारत का सवाब जन्नत है, इमाम मोहम्मद तक़ी अ.स. ने फ़रमाया, जो भी पूरे शौक़ और पूरी मारेफ़त के साथ मेरी फुफी की ज़ियारत करेगा वह जन्नत में जाएगा।

मुंतहल आमाल, जिल्द 2, पेज 378
करीम-ए-अहलेबैत अ.स., पेज 63-64
कश्फ़ुल लेयाली से नक़्ल करते हुए दलाएलुल इमामत, पेज 309
ज़िदगानी-ए-हज़रत मासूमा स.अ., मंसूरी, पेज 14
रियाज़ुल अंसाब से नक़्ल करते हुए बिहारुल अनवार, जिल्द 57, पेज 219
मुस्तदरके सफ़ीनतुल बिहार, पेज 596
कामिलुज़ ज़ियारात, पेज 536
रियाहीनुश शरीयह, जिल्द 5, पेज 35
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