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Date of publication : 26/1/2019 17:12
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अक़ीदे के उसूलों पर ध्यान रखना वाजिब है

उसूले दीन के पहचानने में ख़ुद फ़िक्र करना और ग़ौर करना ज़रूरी है, इस बारे में किसी के लिए भी किसी दूसरे की पैरवी जाएज़ नहीं है। ग़ौर व फ़िक्र द्वारा उसूले दीन की पहचान करना शरीयत के हुक्म से पहले अक़्ल के हुक्म के मुताबिक़ वाजिब है, और साफ़ शब्दों में यूं समझ लीजिए कि रिवायतें और किताबें इस अक़्ल से समझने वाली दलील की पुष्टि करती हैं लेकिन हम दीनी किताबों और रिवायतों को दलील के तौर पर पेश नहीं करते।
विलायत पोर्टल : हमारा अक़ीदा है कि अल्लाह ने हमें सोचने की ताक़त और अक़्ल जैसी क़ुव्वत दे कर हमारे लिए ज़रूरी कर दिया है कि हम उसकी मख़लूक़ के संबंध में सोचें, उसकी पैदा की हुई चीज़ों में उसकी निशानियां देखें और दुनिया की पैदाइश और अपने जिस्म की बनावट में उसकी हिकमत और तदबीर की मज़बूती को बहुत ध्यान से पढ़ें, जैसाकि अल्लाह का क़ुर्आन में इरशाद है कि, हम बहुत जल्द दुनिया और इंसानों की पैदाइश में अपनी अज़मत की निशानियां दिखाएंगे ताकि उन पर ज़ाहिर हो जाए कि अल्लाह ही हक़ है। (सूरए सजदा, आयत 53)
एक और जगह पर अल्लाह ने उन लोगों की जो अपने बुज़ुर्गों की परंपरा की हर तरह की बातों की पैरवी करते हैं उनकी निंदा करते हुए फ़रमाया, उन्होंने कहा कि हम उस तरीक़े पर चलते हैं जिस पर हम ने अपने बुज़ुर्गों को देखा है, तो क्या उनके बुज़ुर्ग कुछ भी समझते हों फिर भी वह वह पैरवी के लायक़ हैं? (सूरए बक़रह, आयत 170)
एक और दूसरी जगह पर अल्लाह उन लोगों की निंदा करते हुए जो अपने वहम, ख़्याल और अंदाजों पर चलते हैं फ़रमाता है कि, (गुमराह और मुशरिक लोग) केवल गुमान (ख़्याल, वहम) पर चलते हैं। (सूरए अनआम, आयत 117)
हक़ीक़त में हमारा यह अक़ीदा हमारी अक़्ल का हुक्म है, जो हम से यह चाहती है कि हम इस पैदा होने वाली दुनिया के बारे में सोचें और इस रास्ते से अपने ख़ालिक़ जिसने हम को पैदा किया है उसको पहचानें, इसी तरह वह हमें हुक्म देती है कि हम उस इंसान की दावत पर ध्यान दें जो पैग़म्बर होने का दावा करता है और उसके मोजिज़ों पर ग़ौर करें, इन सारी बातों में हमारे लिए दूसरों की पैरवी सही नहीं है चाहे वह कितने ही ऊंचे मर्तबे के मालिक हों।
क़ुर्आन में इल्म और मारेफ़त की पैरवी और ग़ौर व फ़िक्र के बारे में जो लोगों में शौक़ पैदा करना चाहा है वह हक़ीक़त में सोंच समझ की मज़बूती और आज़ादी को बयान करता है जिस से सभी अक़्लमंद इंसान सहमत हैं, वास्तव में क़ुर्आन हक़ीक़तों को पहचानने और उनको समझने की ख़ुदा की दी हुई सलाहियत से हमारी रूहों को आगाह करता है और ज़ेहनों को झिंझोड़ कर अक़्ल की फ़ितरी ज़रूरतों की तरफ़ उनकी रहनुमाई करता है, इसलिए यह बात ठीक नहीं है कि इंसान अक़ीदे के मामलों में ला परवाह रहे, और याद रखे कि अपने लिए किसी एक रास्ते को न चुने या हर किसी की बिना सोचे समझे पैरवी न करे, बल्कि अक़्ल की फ़ितरी आवाज़ के मुताबिक़ जिसकी पुष्टि क़ुर्आन की बहुत सारी आयतों से भी होती है, सोचे समझे और अक़ीदों के उसूलों को जिन्हें उसूले दीन कहते हैं बहुत ध्यान से पढ़े, उनमें सबसे अहम तौहीद, नबुव्वत और क़यामत है।
जिश शख़्स ने इन में अपने बुज़ुर्गों या दूसरे लोगों की पैरवी की बेशक वह ग़लती कर बैठा है और सीधे रास्ते से भटक गया है उसे बिल्कुल भी माफ़ नहीं किया जाएगा।
इस मामले में हमारे अक़ीदे का निचोड़ केवल दो बातें हैं....
1- उसूले दीन के पहचानने में ख़ुद फ़िक्र करना और ग़ौर करना ज़रूरी है, इस बारे में किसी के लिए भी किसी दूसरे की पैरवी जाएज़ नहीं है।
2- ग़ौर व फ़िक्र द्वारा उसूले दीन की पहचान करना शरीयत के हुक्म से पहले अक़्ल के हुक्म के मुताबिक़ वाजिब है, और साफ़ शब्दों में यूं समझ लीजिए कि रिवायतें और किताबें इस अक़्ल से समझने वाली दलील की पुष्टि करती हैं लेकिन हम दीनी किताबों और रिवायतों को दलील के तौर पर पेश नहीं करते।
उसूले दीन की पहचान को अक़्ल के मुताबिक़ पहचानने को वाजिब कहने का मतलब यह है कि अक़्ल, उसूले दीन की पहचान की ज़रूरत और इस मामले में सोंचने समझने की ज़रूरत को साफ़ तौर से समझ लेती है।
यह तो हमारे बुनियादी अक़ीदों की बात थी, इसके अलावा और भी बहुत अक़ीदे हैं जो उसूले दीन में शामिल तो नहीं हैं लेकिन हमीरे अक़ीदों का हिस्सा हैं, उन सब पर भी हमें ध्यान देने की ज़रूरत है क्योंकि बहुत सी चीज़ें हमें अपने बुज़ुर्गों से रस्म और रिवाज के नाम से मिलती हैं लेकिन हम उन्हें अक़ीदा समझे बैठे हैं, हमें उन सारी चीज़ों के बारे में ग़ौर करने की ज़रूरत है, क्योंकि कहीं ऐसा न हो हम किसी रस्म और रिवाज को अक़ीदा और दीन का हिस्सा समझ कर अंजाम दे रहे हों जबकि उसका दीन से दूर दूर का कोई रिश्ता न हो, और ऐसा समाज कई बार देखा भी गया है कि हम बुज़ुर्गों की शुरू की हुई रस्मों को ले कर चल रहे थे और उस पर मज़बूत अक़ीदा बनाए हुए थे लेकिन बाद में पता चला कि वह अक़ीदा नहीं बल्कि केवल एक रस्म है।
यहां पर कहने का मतलब यह नहीं है कि सारी रस्मों और रिवाजों को किनारे रख दिया जाए, हालांकि बेतुकी और दीन से दूर रस्मों की इस्लाम में कोई जगह नहीं है लेकिन वह रस्में जो दीन के दायरे में हैं उन्हें अल्लाह के लिए रस्म ही रहने दें उन्हें दीन का हिस्सा न बनाएं।
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