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Date of publication : 30/1/2019 18:33
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शैख़ मुफ़ीद र.ह. की ज़िंदगी पर एक निगाह

एक दिन मैं आगे बढ़ा और कहा, ऐ शैख़, मैं आपसे मसला पूछना चाहता हूं, उसने कहा कि अपना मसला बताओ, तो शैख़ फ़रमाते हैं कि मैंने कहा आप इस शख़्स के बारे में क्या कहते हैं कि जो आदिल इमाम के ख़िलाफ़ जंग लड़े, उसने कहा वह काफ़िर है, फिर उसने अपनी ग़लती को सुधारते हुए कहा कि काफ़िर नहीं बल्कि फ़ासिक़ है, तो फिर मैंने कहा अमीरुल मोमेनीन अली इब्ने अबी तालिब अ.स. के बारे में आपका क्या ख़्याल है? तो उसने कहा वह आदिल इमाम हैं, शैख़ कहते हैं कि फिर मैंने कहा जंगे जमल, तल्हा और ज़ुबैर के बारे में क्या कहते हैं? तो उन्होंने कहा कि उन लोगों ने तौबा कर ली थी... मैंने तुरंत मौक़ा पा कर कहा कि जंगे जमल दिरायत है जबकि तौबा की ख़बर रिवायत है.......
विलायत पोर्टल :  नाम, कुन्नियत और लक़ब
आपका नाम मोहम्मद इब्ने मोहम्मद इब्ने नोमान आपकी विलादत 11 ज़ीक़ादा सन् 336 हिजरी को हुई और माहे रमज़ान में जुमे के दिन सन् 423 हिजरी में आपकी वफ़ात हुई। (रेजाले नज्जाशी, पेज 203)
आपका लक़ब मुफ़ीद (र.ह.) कुन्नियत अबू अब्दिल्लाह जबकि इब्नुल मोअल्लिम के नाम से मशहूर थे (अमलुल आमिल, हुर्रे आमेली, जिल्द 2, पेज 205) चूंकि आपके वालिद वासित में मोअल्लिम का फ़रीज़ा अदा कर रहे थे इसलिए इब्नुल आमिल के नाम से मशहूर हुए। (लिसानुल मीज़ान, जिल्द 5, पेज 365)
आपके लक़ब मुफ़ीद के मशहूर होने की वजह
आपके उस्ताद अबू यासिर जिनके पास आपने अपनी तालीम शुरू की थी, उन्होंने आप से एक दिन कहा कि आप अली इब्ने ईसा रूमानी के यहां क्यों इल्मे कलाम नहीं पढ़ते और उनसे फ़ायदा हासिल क्यों नहीं करते हैं, तो उस पर आपने कहा कि, मैं उनको नहीं जानता और ना ही उनसे क़रीब हूं, तो आप किसी को मेरे साथ भेज दीजिए ताकि वह मेरी रहनुमाई कर सके, शैख़ मुफ़ीद र.ह. फ़रमाते हैं कि अबू यासिर ने ऐसा ही किया और एक शख़्स को मेरे साथ भेजा, मैं अली इब्ने ईसा के पास गया तो वहां उनके शागिर्दों की भीड़ जमा थी, मैं भी वहीं बैठ गया, जब लोग जाने लगे और भीड़ कम हुई तो मैं उनके पास गया, इसी बीच एक शख़्स अंदर आया और उसने अली इब्ने ईसा से कहा कि कोई शख़्स बाहर आया है वह आपके पास हाज़िर होना चाहता है और बसरा का रहने वाला है, अली इब्ने ईसा ने पूछा कि क्या वह आलिम है? उसने कहा नौजवान है लेकिन मुझे नहीं मालूम वह आलिम है या नहीं, बस वह आपसे मुलाक़ात करना चाह रहा है, अली इब्ने ईसा ने उसको आने की इजाज़त दी और उसका सम्मान किया।
दोनो के बीच काफ़ी लंबी बातचीत हुई, उस बसरे से आने वाले ने अली इब्ने ईसा से कहा कि यौमे ग़दीर और यौमे ग़ार (यानी अबू बक्र का ग़ार में पैग़म्बर स.अ. के साथ होना) के बारे में तुम्हारा क्या ख़्याल है? तो अली इब्ने ईसा ने कहा कि ग़ार की ख़बर दिरायत है जबकि ग़दीर की ख़बर रिवायत है और दिरायत यक़ीन की मंज़िल रखती है चूंकि ग़ार की ख़बर क़ुर्आन में है इसलिए उसमें शक नहीं पाया जाता जबकि ग़दीर की ख़बर रिवायत से हासिल हुई जिसका सही होना यक़ीनी नहीं है, शैख़ मुफ़ीद र.ह. कहते हैं कि उस बसरी के पास इसका जवाब नहीं था और वह वहां से चला गया।
शैख़ र.ह. कहते हैं कि एक दिन मैं आगे बढ़ा और कहा, ऐ शैख़, मैं आपसे मसला पूछना चाहता हूं, उसने कहा कि अपना मसला बताओ, तो शैख़ फ़रमाते हैं कि मैंने कहा आप इस शख़्स के बारे में क्या कहते हैं कि जो आदिल इमाम के ख़िलाफ़ जंग लड़े, उसने कहा वह काफ़िर है, फिर उसने अपनी ग़लती को सुधारते हुए कहा कि काफ़िर नहीं बल्कि फ़ासिक़ है, तो फिर मैंने कहा अमीरुल मोमेनीन अली इब्ने अबी तालिब अ.स. के बारे में आपका क्या ख़्याल है? तो उसने कहा वह आदिल इमाम हैं, शैख़ कहते हैं कि फिर मैंने कहा जंगे जमल, तल्हा और ज़ुबैर के बारे में क्या कहते हैं? तो उन्होंने कहा कि उन लोगों ने तौबा कर ली थी...
मैंने तुरंत मौक़ा पा कर कहा कि जंगे जमल दिरायत है जबकि तौबा की ख़बर रिवायत है, (चूंकि अली इब्ने ईसा ने बसरी को जवाब दिया था कि दिरायत, रिवायत से ज़्यादा मज़बूत और यक़ीन के क़ाबिल है, इसलिए दिरायत (ग़ार वाली ख़बर) को लेंगे और ग़दीर की ख़बर चूंकि रिवायत है इसलिए उसको नहीं अपनाएंगे, शैख़ ने कहा जंगे जमल दिरायत है इसलिए उसको क़ुबूल करेंगे जबिक तौबा की ख़बर रिवायत है उसको नहीं लेंगे) उसने कहा क्या तुम उस समय मौजूद थे जब उस बसरी ने मुझ से सवाल किया था? तो मैंने कहा, जी हां, मैं मौजूद था, फिर उसने पूछा तुम्हारा नाम क्या है और किस के पास पढ़ते हो? तो मैंने कहा कि मेरी पहचान इब्ने मोअल्लिम है और मैं अबू अब्दिल्लाह अल-जअली के पास पढ़ता हूं।
उसने कहा अपनी जगह बैठो मैं आता हूं, फिर वह अपने घर गया और जब वापस आया तो उसके हाथ मे एक काग़ज़ था जिसे उसने लिखा था और उसको काग़ज़ में लपेट कर दे दिया और कहा इसे अबू अब्दिल्लाह तक पहुंचा देना, मैं उसे ले कर अबू अब्दिल्लाह के पास आया और दे दिया, वह पढ़ कर हंसने लगे फिर मुझ से पूछा कि वहां क्या माजरा पेश आया... क्योंकि उसने मुझ से तुम्हारे बारे में वसीयत की है और तुम्हें मुफ़ीद का लक़ब दिया है, मैंने सारी दास्तान अबू अब्दिल्लाह के सामने बयान कर दिया तो वह मुस्कुराने लगे। (मजमूअतो वर्राम, जिल्द 2, पेज 621)
आपकी विलादत
आपका ख़ानदान वासित का रहने वाला था, फिर आपके वालिद ने बग़दाद से 55 किलोमीटर की दूरी पर मौजूद शहर ओकबरा की तरफ़ हिजरत की, उसके बाद बग़दाद की तरफ़ चले गए, आपके वालिद वासित में मोअल्लिम (उस्ताद, टीचर) थे, इसी वजह से आपको इब्ने मोअल्लिम कहा जाता था, आपकी विलादत ओकबरा के इलाक़े सुवैक़ा बिन अल-बसरी में 11 ज़ीक़ादा 336 हिजरी में हुई, जबकि एक क़ौल की मुताबिक़ 338 हिजरी में हुई। (ख़ुलासतुल अक़वाल फ़ी मारेफ़तिर-रेजाल, अल्लामा हिल्ली, पेज 893)
शुरूआती तालीम
आपने अपनी तालीम की शुरूआत अबू अब्दिल्लाह जो अल-जअली के नाम से मशहूर थे उनके पास से की, जो कि रियाह नाम की जगह पर पढ़ाते थे, जबकि आपका घर भी उसी मोहल्ले में था, फिर अपनी तालीम को अबू यासिर जो कि अबुल जैश के ग़ुलाम थे उनके पास जारी रखा जो कि बाबे ख़ुरासान में दर्स दिया करते थे, अबू अब्दिल्लाह या अबू यासिर ने आपकी इल्मी सलाहियत और ज़ेहानत देख कर आपको अपने से ज़्यादा माहिर और बेहतर उलमा के पास पढ़ने का मशिवरा दिया।
इल्मी ख़िदमत
मोहम्मद हुसैन नस्सार अपनी किताब जोहूदुश-शैख़ अल-मुफ़ीद अल-फ़िक़हिय्या व मसादिरो इस्तेंबातेहि के मुक़द्दमे में लिखते हैं कि, हम शैख़ मुफ़ीद र.ह. के इल्मी मक़ाम का अंदाज़ा उनके इल्मी आसार और किताबों से अच्छी तरह लगा सकते हैं, उन्होंने सबसे पहले फ़िक़्ह को मुनज़्ज़म किया और उसको अलग अलग बाब (चैप्टर) में बयान किया, अहकाम, वाजिब हराम को अलग अलग चैप्टर में बयान किया, और वह फ़िक़्ह जो रिवायात और हदीसों की शक्ल में बिखरी हुई थी उसे अहकाम की शक्ल में मुनज़्ज़म किया, इसी तरह इल्मे उसूल के क़ायदे बिखरे हुए थे हर फ़िक़्ही मसले के साथ उसूली क़ायदा मौजूद था और चूंकि पहले जब भी फ़क़ीह किसी फ़िक़्ही मसले को बयान करता था उसी के साथ उसकी दलील भी ज़िक्र करता था, शैख़ मुफ़ीद र.ह. वह पहले शख़्स थे जिन्होंने इल्मे उसूल के क़ायदों को फ़िक़्ही मसलों से अलग कर के मुनज़्ज़म शक्ल में तैयार किया।
इसी तरह शैख़ मुफ़ीद र.ह. को शिया इल्मे कलाम और मुनाज़ेरे की बुनियाद रखने का शरफ़ हासिल है, जबकि अदब और शायरी में बुलंद मक़ाम रखते थे। (जोहूदुश-शैख़ अल-मुफ़ीद अल-फ़िक़हिय्या व मसादिरो इस्तेंबातेहि, मोहम्मद हुसैन नस्सार, पेज 15-16)
वह ख़ुद फ़रमाते हैं कि एक दिन मैं एक मजलिस में गया तो इब्ने जौज़ी अख़लाक़ का दर्स दे रहा था, मै उसके दर्स में मौजूद था जबकि किसी को मेरे होने की ख़बर न थी, तो इब्ने जौज़ी ने मेरे शेर को एक जगह दलील के तौर पर इस्तेमाल किया और कहा कि इब्ने मोअल्लिम ने क्या ख़ूब शेर कहा है।
अहले सुन्नत के उलमा की निगाह में शैख़ मुफ़ीद का मर्तबा
इब्ने जौज़ी कहते हैं कि इब्ने मोअल्लिम की एक इल्मी और मुनाज़ेरे की क्लास हुआ करती थी जो उन्हीं के घर में उनके मोहल्ले में होती थी जिसमें सारे उलमा शामिल होते थे।
इब्ने कसीर अपनी किताब अल-बिदायह वन निहायह में लिखते हैं कि सारे फ़िर्क़े और विचारधाराओं के लोग बड़ी तादाद में वहां हाज़िर होते थे।
इब्ने कसीर ही लिखते हैं कि इब्ने मोअल्लिम अबू अब्दिल्लाह हमारे ज़माने के हैं, और शिया इल्मे कलाम को उन्होंने ही शिखर पर पहुंचाया, अपने मज़हब के उलमा में इल्मे कलाम में सबसे आगे, बहुत ही दूर अंदेश, ज़हीन और अक़्लमंद इंसान थे, मैंने उनको क़रीब से देखा और वह अनेक उलूम में माहिर थे और उनकी बहुत सारी किताबें अलग अलग विषय पर मौजूद हैं।
शिया उलमा की निगाह में शैख़ मुफ़ीद र.ह. का मर्तबा
सय्यद बहरुल उलूम अपनी किताब अल-फ़वाएदुर-रेजालिय्यह में लिखते हैं कि सारे उलमा उनके इल्म, फ़िक़्ह, क़ाबिलियत, अदालत, जलालत और बुज़ुर्गी पर एकमत हैं, आप में बहुत सारी ख़ूबियां पाई जाती थीं, आप ज़हीन और बहुत ही हाज़िर जवाब थे।
हदीस और रिवायतों का बहुत गहरा इल्म रखते थे, शायरी, इल्मे रेजाल और तारीख़ के माहिर थे, हदीस में अपने ज़माने में सबसे ज़्यादा भरोसेमंद और फ़िक्ह और कलाम के सबसे बड़े आलिम थे, जो भी उनके बाद आया उसने उनकी किताबों और तहरीरों से फ़ायदा हासिल किया। (अल-फ़वाएदुर-रेजालिय्यह, सैय्यद बहरुल उलूम, जिल्द 3, पेज 312)
अल्लामा हिल्ली र.ह. अपनी किताब ख़ुलासतुल अक़वाल और शैख़ हुर्रे आमली अपनी किताब अमलुल आमाल में फ़रमाते हैं कि इल्मे फ़िक़्ह, कलाम और हदीस के मैदान में उनकी फ़ज़ीलत किसी बयान की मोहताज नहीं है, आप अपने ज़माने के सबसे भरोसेमंद और क़ाबिल इंसान थे।
आपकी वफ़ात और क़ब्र
माहे रमज़ान 413 हिजरी को आपकी वफ़ात हुई, आपकी नमाज़े जनाज़ा बग़दाद के बहुत बड़े मैदान में हुई, यह मैदान बहुत बड़ा था उसके बावजूद यह मैदान छोटा पड़ गया, कहा जाता है कि उस ज़माने में आपके जनाज़े में 80 हज़ार लोग शामिल हुए थे, शैख़ की नमाज़े जनाज़ा पढ़ने वालों में शियों के साथ साथ अहले सुन्नत के उलमा और आम लोग  भी शामिल थे।
आपकी नमाज़े जनाज़ा आपके अज़ीम शागिर्द सय्यद मुर्तज़ा ने पढ़ाई, और आपकी मौत का सदमा लोगों के लिए इतना सख़्त था कि लोग मरसिया पढ़ रहे थे। आप दो साल बग़दाद में अपने घर ही में दफ़्न रहे फिर कुछ कारणों के चलते आपको काज़मैन में इमाम मोहम्मद तक़ी अ.स. के पांव की तरफ़ अबू जाफ़र और इब्ने क़ौलवैह के पहलू में दफ़्न कर दिया गया।
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