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Date of publication : 5/2/2019 18:13
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आख़ेरत में अंधेपन का क्या मतलब है....

अधेपन का मतलब जिस्म पर मौजूद आंखों का अंधा होना नहीं है, बल्कि इसका मतलब इंसान जान बूझ कर अपने आप का अंधा बनाए, यानी अल्लाह की निशानियों और पैग़म्बर स.अ. की सच्चे होने को देखता है और हक़ और हक़ीक़त तक पहुंचता है, लेकिन दिल से उन पर अक़ीदा नहीं रखता, बिल्कुल ऐसे कि जैसे उसकी आंखों ने उन निशानियों और अज़मतों को देखा ही नहीं, वह दीनी मसाएल के साथ ऐसा बर्ताव करता है कि जैसे न उन्हें देखा न सुना, इसलिए हक़ बात कहने और उसे स्वीकार करने से इंकार करता है और क़ुर्आन के शब्दों में यह जानबूझ कर अंधा बहरा और गूंगा है।

विलायत पोर्टल :
अल्लाह के इस फ़रमान कि, जो लोग दुनिया में अंधे हैं वह आख़ेरत में भी अंधे होंगे... का क्या मतलब है?
इस आयत और इस जैसी दूसरी आयतों में अधेपन का मतलब जिस्म पर मौजूद आंखों का अंधा होना नहीं है, बल्कि इसका मतलब इंसान जान बूझ कर अपने आप का अंधा बनाए, यानी अल्लाह की निशानियों और पैग़म्बर स.अ. की सच्चे होने को देखता है और हक़ और हक़ीक़त तक पहुंचता है, लेकिन दिल से उन पर अक़ीदा नहीं रखता, बिल्कुल ऐसे कि जैसे उसकी आंखों ने उन निशानियों और अज़मतों को देखा ही नहीं, वह दीनी मसाएल के साथ ऐसा बर्ताव करता है कि जैसे न उन्हें देखा न सुना, इसलिए हक़ बात कहने और उसे स्वीकार करने से इंकार करता है और क़ुर्आन के शब्दों में यह जानबूझ कर अंधा बहरा और गूंगा है।
आख़ेरत की अधिकतर सज़ाएं आमाल का जिस्म की शक्ल में आने के बाद है, उसके दिल का अंधा होना, सामने ज़ाहिर हो कर उसके लिए अज़ाब और तकलीफ़ का कारण बन जाता है, महशर में अल्लाह की निशानियां और मोमेनीन चमक रहे होंगे और वह अंधा है जो हक़, मोमेनीन के नूरानी चेहरे और जन्नत की नेमतों को देखने की ताक़त नहीं रखता और जन्नत की तरफ़ जाने वाले रास्ते को नहीं पा सकता है, लेकिन उसके जहन्नम में दाख़िल होने के बाद उसके अज़ाब में शिद्दत पैदा होने के लिए, अलग अलग तरह के अज़ाब और अज़ाब झेल रहे जहन्नमियों को देखने के लिए उसकी आंखें खुल जाती है, चूंकि दुनिया में भी ऐसा ही था कि हक़ और हक़ीक़त के सामने वह अपनी आंखों को बंद कर लेता था और बातिल, दुनिया और दुनिया परस्ती करने वालों के लिए अपनी आंखें खोले रखता है।
इंसान का ढ़ांचा अलग अलग पहलुओं और क्षमता रखता है, जिनमें से कुछ ज़ाहिरी और महसूस किए जाने वाले हैं और कुछ बातिनी और इंसान की रूह में संबंधित हैं, लेकिन ज़ाहिरी क्षमता बदन की नौकर और बदन की ज़रूरतों को पूरा करने के अलावा दिल तक सूचना पहुंचाने का काम करती हैं और साथ ही जज़्बात और भावनाओं को उभारने वाली भी हैं, अब अगर इंसान महसूस होने वाली नेमतों ख़ास कर आंख और कान से भरपूर फ़ायदा उठाए और इन दोनों का सही इस्तेमाल करे और अपनी इंसानियत की बुलंदी में उनसे फ़ायदा उठाए तो उसको समीअ (सुनने वाला) और बसीर (देखने वाला) कहा जा सकता है, लेकिन अगर इन नेमतों से सही फ़ायदा नहीं हासिल किया और उनसे हासिल होने वाले मआरिफ़ के बारे में अनसुना और अनदेखा किया और उन मआरिफ़ के बारे में इक़रार की ज़ुबान न खोले तो इसका मतलब यह है कि वह सुनने वाला और देखने वाला नहीं था, क्योंकि उसकी आंखों और कानों का वह फ़ायदा नहीं है जो उसकी पाक ज़िंदगी के लिए होना चाहिए था, और यह फ़ायदा हासिल न कर पाना उसकी आंखों और कानों में कमी की वजह से नहीं है बल्कि यह उन नेमतों के बारे उसके इख़्तेयार का ग़लत इस्तेमाल और बेदारी न होने का नतीजा है।
इस हिसाब से मुमकिन है कि इंसान, अल्लाह, ख़ालेक़िय्यत और उसकी रहमत और इनायत की निशानियों को देखता है लेकिन अल्लाह पर ईमान नहीं रखता, पैग़म्बर स.अ. की सच्चाई और उनके मोजिज़ों को देखता है लेकिन उनकी पुष्टि (तसदीक़) नहीं करता और उनके फ़रमान और हुक्म के सामने सर नहीं झुकाता है, इमाम अली अ.स. के बारे में पैग़म्बर स.अ. की हदीसों को सुनता है और उनकी अज़मतों और फ़ज़ीलतों समझता है लेकिन उनका इंकार करता है और नतीजे में वली की विलायत का इंकार करता है और विलायत के तहत नहीं आता है बल्कि उनके मुक़ाबले पर खड़ा हो जाता है, या अल्लाह और रसूल के ज़िक्र और उनकी सदाक़त, क़यामत के ज़रूरी गोने की अलामतों के बावजूद उस जन्नत और जहन्नम के वुजूद का इंकार करता है जिसमें हमेशा रहना है, अगर किसी ने दुनिया में अपनी पूरी उम्र इस तरह गुज़ारी और अपनी आंखों को इंसानियत और मानवियत की तरफ़ से बंद रखा और उनसे मुंह मोड़ लिया और अल्लाह और उसके रसूल की इताअत और उसके वली के हुक्म के सामने सर झुकाने से इंकार किया तो वह आख़ेरत में जो आमाल के जिस्म की शक्ल इख़्तेयार करने की जगह है वहां ख़ुदा के जमाल, पैग़म्बर स.अ., अल्लाह के औलिया, मोमेनीन की मलकूती चेहरों और जन्नत की नेमतों को देखने से महरूम रहेगा और जहन्नम में जाएगा और जिस तरह दुनिया में दिल के अंधेपन की वजह से सआदत के रास्ते में आगे नहीं बढ़ सका आख़ेरत में भी अंधा महशूर होगा और जन्नत में जाने से महरूम होगा।
क़ुर्आन में क़यामत में अंधेपन के कई कारण इस तरह बयान हुए हैं.....
अल्लाह का इंकार और केवल दुनिया के पीछे भागना और ख़्वाहिशे नफ़्स की पैरवी (सूरए ताहा, आयत 124 और 127, सूरए इसरा, आयत 72 और 97)
दीनी मामलात में ज़िद और बहाने बनाना (सूरए फ़ुस्सेलत, आयत 17)
आख़ेरत को भुला देना और और उस पर ईमान न रखना (सूरए नम्ल, आयत 66)
लोगों को दीन से रोकना और अल्लाह की तरफ़ झूठी निसबत देना (सूरए हूद, आयत 18 और 28)
अल्लाह की निशानियों को झुठलाना और पैग़म्बर स.अ. पर ईमान न रखना (सूरए अनआम, आयत 4 और 5, सूरए आराफ़, आयत 64, सूरए बक़रह, आयत 17 और 18)
रिश्तेदारों से दूरी बना लेना (क़त-ए-रहेम) और वली की विलायत को क़ुबूल न करना और सरकशी और बग़ावत करना (सूरए मोहम्मद, आयत 22 और 23)
इसके अलावा हदीसों में भी अंधेपन और हक़ को न देख पाने के यही (ऊपर बयान किए गए) कारण बयान किए गए हैं, उसके अलावा इमाम अली अ.स. की विलायत का इंकार और हज वाजिब होने के बावजूद हज को अंजाम न देना भी आख़ेरत में अंधेपन का कारण है। (अतयबुल बयान, जिल्द 18, पेज 287, 288)
लेकिन क़ुर्आन के ज़ाहिर और कुछ हदीसों और मुफ़स्सेरीन की तहक़ीक़ (विश्लेषण) से मालूम होता है कि, क़यामत में अलग अलग रुकने की जगहें हैं ताकि आख़िर में जन्नत वाला जन्नत की तरफ़ चला जाए और जहन्नम वाले को जहन्नम में डाल दिया जाए, इस गिरोह का अंधापन महशर में रुकने की जगहों से संबंधित है ताकि जहन्नम में जाने से पहले अल्लाह के जलाल और जबरूत और अल्लाह के औलिया को देखने से महरूम रहे, लेकिन जहन्नम में जाने के बाद उसकी आंखें खुल जाती हैं ताकि अल्लाह के औलिया को न देखने और अज़ाब झेल रहे जहन्नमियों को देखने से उसके अज़ाब में इज़ाफ़ा हो जाए।
कुछ बद दिमाग़ लोगों का ख़्याल है कि आयत में (मन काना फ़ी हाज़ेही आमा) अंधा होने से मुराद दुनिया में अंधापन है, यानी जो दुनिया में अंधे हैं वह चाहे जितने भी बसीर और फ़क़ीह क्यों न हों आख़ेरत में अंधे ही महशूर होंगे, जबकि आयत का मक़सद ऐसा नहीं है और आयत में फ़ी हाज़ेही आमा का मतलब दुनिया में उनका अंधापन है लेकिन फ़हुवा फ़िल आख़िरते आमा का मतलब ज़ाहिरी अंधापन और उसके चेहरे पर दिल के अंधे होने का ज़ाहिर होना है ताकि उसके अज़ाब का कारण बने, लेकिन जहन्नम में दाख़िल होने के बाद सारे अज़ाब और उसके आमाल का जिस्म की शक्ल में आने पर उसकी आंख खुल जाती है।


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